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बुधवार, 19 जनवरी 2022

हिंदी मेरी पहचान

 हिंदी मेरी पहचान




संस्कृत से जन्मी हिन्दी


हृदय को छू जाती है,


मन में आते भावों को


उचित शब्द दे जाती है,


भाषा की संतुष्टि,


हिन्दी से जो आती है,


पढ़ूँ भी हिन्दी,लिखूँ भी हिन्दी


हर सोच हिन्दी को भाती है,


है हिंदी जब मातृभाषा,


यूँ तो सबको आती है,


फिर क्यों बोलने में कुछ को,


अक़्सर शरम आती है,


मातृभाषा का अपनी सम्मान करो,


ये भाषा भी राष्ट्रभक्ति सिखाती है,


हिन्दी तो है अब राष्ट्रभाषा,


जो भारत की शान बढ़ाती है,


हिन्दी मात्र भाषा नहीं,


ये भावनाओं का उद्गार है,


आने वाली पीढ़ी को,


यह अमूल्य उपहार है,


मेरी संवेदनाओं को शब्द देती,


यह हिन्दी मेरी पहचान है,


अमूल्य विरासत में मिली


यह हिन्दी मेरा अभिमान है,





✍️तोषी गुप्ता✍️


27-08-2021

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अधूरी ख़्वाहिशें

 अधूरी ख्वाहिशें





ये अधूरी ख्वाहिशें,


बहुत तकलीफ़ देती हैं,


ना जीने देतीं हैं,


और ना रातों को सोने देती हैं,


रात में ये अधूरी ख्वाहिशें,


जाग सी जाती हैं,


हर पल इन ख्वाहिशों को पूरा करने,


नये ताने-बाने बुनती,


एक के बाद एक ख्वाहिशों की,


जैसी एक रील चल पड़ती,


जैसे फ़िल्म में एक सीन के बाद,


दूसरे सीन की दूसरी रील चलती,


एक ख्वाहिश को पूरा करने के सपने संजोते ही,


दूसरी ख्वाहिश कसमसाती हुई,


अपना सर उठाती और मन दौड़ चलता,


पुनः दूसरी ख्वाहिश को पूरा करने सपने संजोने


इस तरह जैसे सारी रात गुजर जाती


और सुबह हो जाती,


फिर उन अधूरी ख्वाहिशों के साथ,


दिन में फिर सर उठाती,


 इन ख्वाहिशों की उलझी लताएँ


और मन चल पड़ता इन ख्वाहिशों को पूरा करने,


और जैसे ही एक ख्वाहिश पूरी होती,


दूसरी ख्वाहिश मुस्कुराती हुई नयी खड़ी हो जाती,


और मन फिर भागता,


इस नयी ख्वाहिश को पूरा करने,


इस तरह हर रोज अधूरी ही रह जाती हैं


 कुछ ख़्वाहिशें , अधूरी ख़्वाहिशें बनकर,




✍️तोषी गुप्ता✍️


19-01-2022

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नई जेनरेशन

नई जेनरेशन



शिवानी अपने पति के साथ बैंगलोर में रहती थी। उसे ऑफिस से कुछ दिनों की छुट्टी मिली तो अपने मम्मी पापा को सरप्राइज़ देने अपने मायके आ गई। उसने धीरे से घर का मुख्य दरवाज़ा खोला और अंदर आ गई। अंदर का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था चुपके से शिवानी अंदर गई। देखा हॉल में कोई नहीं था लेकिन माँ पापा के कमरे से आ रही आवाज़ों को सुनकर शिवानी वहीं ठिठक गई।



"पूनम, जितना ये घर मेरा है उतना तुम्हारा भी है। तो इस घर के प्रति तुम्हारी भी तो कोई जिम्मेदारी बनती है।" 



"देखो प्रकाश, मैं पहले भी कह चुकी हूँ, कि घर के सारे खर्चे तुम्हें ही करने होंगे। मैं मानती हूँ कि इस घर के प्रति मेरी भी जिम्मेदारी है और वो मैं अच्छे से निभा रही हूँ, लेकिन मैं अपनी सैलरी ऐसे घर के खर्चों में नहीं लगा सकती" 



"पूनम , तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रही। अभी तक तो मैंने कभी तुमसे तुम्हारी सैलरी का एक भी रुपये खर्च करने के लिए नहीं कहा। अब जब मेरा कारोबार कोरोना की वजह से धीमा हो गया है तो घर के लोन की किश्तें चुकाने ही तो बोल रहा हूँ।" प्रकाश ने एक बार फिर पूनम को समझाने की कोशिश की।



"मैंने एक बार कह दिया मैं अपनी सैलरी नहीं दूंगी तो नहीं दूंगी।" कहते हुए पूनम गुस्से से कमरे से बाहर हॉल में आ गई।



हॉल में अचानक शिवानी को देख पूनम हतप्रभ रह गई और थोड़ा झेंपते हुए कहा, "अरे बेटा, तुम कब आई, पता ही नहीं चला।" खुशी से पूनम ने अब शिवानी को गले से लगा लिया।



"बस अभी-अभी पहुंची माँ, और आपकी और पापा की बातें सुनकर यहीं रुक गई।"



"अरे, तू भी क्या लेकर बैठ गई।अभी आई है, जा जाकर फ्रेश हो जा। मैं तेरी पसंद का कुछ बनाकर लाती हूँ।"



तब तक प्रकाश भी हॉल में आ गए थे। शिवानी दौड़कर पापा के गले लग गई। फिर माँ की तरफ मुड़ते हुए कहा, 



"अभी नहीं माँ, पहले मुझे आप लोगों से बात करनी है। माँ , पापा बिल्कुल सही कह रहे हैं। घर के फाइनेंशियल मैटर में भी आपका योगदान होना चाहिए।"



"पर बेटा, घर चलाना घर के पुरुष का काम होता है।"



"माँ आप कब से ये सब मानने लगीं। पापा भी तो घर के छोटे-मोटे काम में आपकी मदद करते हैं न। तो घर चलाने में आप उनकी मदद क्यों नहीं कर सकतीं।"



शिवानी ने आगे कहा,"अब मुझे और विशाल को ही ले लो। हम दोनों ही नौकरीपेशा हैं, और घर के सारे खर्चे आपस में मिलकर करते हैं , वहीं घर के सारे काम भी मिलकर करते हैं। घर फोन, वाई-फाई, टीवी रिचार्ज, गैस रसोई के खर्चे और कार की किश्तें मैं भर देती हूँ, तो फ्रिज़, टीवी की किश्तें और घर के लोन विशाल भर देता है। इस तरह हम दोनों ही घर के खर्चों में बराबर भागीदार रहते हैं। वहीं मेरी शिफ्ट सुबह जल्दी होने के कारण विशाल सुबह मेरी काम में मदद करते हैं। और लंच प्रिपेयर करते हैं। तो ऑफिस से आने के बाद रात का खाना मैं तैयार करती हूँ। इस तरह हम दोनों ही हर काम मिलकर करते हैं। आख़िर घर हम दोनों से है।"



पूनम बहुत शांति से शिवानी को सुन रही थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा,"बहुत बड़ी और समझदार हो गई है मेरी बेटी।" 



"लाओ, कहाँ सिग्नेचर करने हैं। घर का लोन चुका दो और अब से मैं भी घर के खर्चों में तुम्हारा बराबर साथ दूँगी। " मुस्कुराते हुए पूनम ने प्रकाश से कहा।



"इसी बात पर मैं अपनी बेटी के लिए बढ़िया अदरक वाली चाय बनाकर लाता हूँ।"



"नई जेनरेशन कितनी समझदार है आज ये पता चल गया।" कहते हुए पूनम ने शिवानी को गले से लगा लिया। 



शिवानी ने कहा, "ये नई जेनरेशन की नई सोच है माँ"  और तीनों हँस पड़े।




✍️तोषी गुप्ता✍️


19-01-2022

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लुभावने विज्ञापन

 लुभावने विज्ञापन 



आज सुबह त्रिपाठी जी लॉन में अपने पौधों को पानी दे रहे थे कि दरवाजे पर ऑटो आकर रुकी। देखा तो वसुधा मुरझाया से चेहरा लेकर ऑटो से उतर रही थी। किसी अनिष्ट की आशंका से त्रिपाठी जी ने अपनी पत्नी मीरा को आवाज देकर बुलाया तब तक वसुधा अंदर आ चुकी थी। मीरा जी ने वसुधा को गले से लगा लिया तो वसुधा फ़फ़क कर रो पड़ी।मीरा जी ने वसुधा को संभाला और अंदर ले गई। 



कुछ समय पश्चात वसुधा ने सारी बातें अपने माता-पिता को बताई। वसुधा की शादी एक मेट्रीमोनियल साइट के माध्यम से हुई थी। दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन सौरभ की प्रोफाइल देखकर सब बहुत प्रभावित हुए थे। वसुधा भी सौरभ के परिवार वालों को बहुत पसंद आई और जल्दी ही उसकी शादी वसुधा से हो गई। समय बहुत हंसी खुशी व्यतीत हो रहा था और शादी के महज़ कुछ ही महीनों बाद वसुधा इस तरह घर लौट आई। 



आज त्रिपाठी जी बहुत दुखी होकर सोच रहे थे काश उन्होंने सिर्फ लुभावने विज्ञापन पर भरोसा ना करके सौरभ के चरित्र और व्यवहार के बारे में भी थोड़ा पता किया होता तो आज उनकी बेटी वसुधा भी सुखी जीवन व्यतीत कर रही होती।



✍️तोषी गुप्ता✍️

18-01-2022

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विज्ञापन

 विज्ञापन



दिलीप जी बहुत परेशान रहते थे आज कल। दरअसल उनतीसवें वर्ष में प्रवेश कर गई थी उनकी बेटी बीना। दिलीप जी को बीना की शादी की चिंता सता रही थी। वैसे सर्वगुण सम्पन्न बीना सौम्य और सरल हृदया थी। बैंक की नौकरी भी थी। जो भी बीना से मिलता एक ही बार में उससे प्रभावित हो जाता। लेकिन शादी की बात आते ही लोग मना कर देते। कारण बीना के शरीर के अंदरूनी हिस्से में सफेद दाग़ के कुछ लक्षण थे। हालांकि कपड़े से ढक जाने के कारण बाहर से ना दिखते ना ही बिना बताए किसी को पता चलते। लेकिन बीना ने स्पष्ट तौर से घर में बता रखा था कि वो शादी करेगी तो सच्चाई बता कर करेगी। दिलीप जी और बीना की माँ भी बीना के इस फैसले से संतुष्ट थे। और यही वजह थी कि बीना की शादी कहीं तय नहीं हो पा रही थी।



एक सुबह दिलीप जी मॉर्निंग वॉक में अपने एक पुराने मित्र शर्मा जी से मिले। काफी दिनों बाद मिलने के कारण बातों का दौर चल निकला। और दिलीप जी ने बातों ही बातों में बीना की शादी के बारे में भी उनसे चर्चा की। शर्मा जी के बहुत पूछने पर दिलीप जी ने शादी ना हो पाने का कारण बताया। शर्मा जी अपनी बहन की शादी के दौरान इस पीड़ा से गुजर चुके थे। उन्होंने दिलीप जी को बिना परिवार और समाज की परवाह किये बीना की शादी का विज्ञापन अख़बार में देने की सलाह दी। और दिलीप जी को समझाया भी कि परिवार और समाज की परवाह करने से ज्यादा जरूरी बीना की शादी और सफल शादी शुदा ज़िन्दगी है। 



अब तक कशमकश से गुज़र रहे दिलीप जी को नई राह मिलते नज़र आई और दूसरे ही दिन उन्होंने सच्चाई बताते हुए बीना की शादी का विज्ञापन अख़बार में दे दिया।  कुछ दिनों बाद ही सुभाष का रिश्ता बीना के लिए आया । सुभाष के परिवार वाले भी सुभाष की शादी के लिए इसी समस्या से गुज़र रहे थे। सुभाष और बीना के परिवार वाले मिले। सुभाष भी उच्च शिक्षित और कॉलेज में प्रोफेसर था। सुभाष और बीना भी एक दूसरे से मिलकर खुश थे और दोनों ने विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी थी। 



और वो दिन भी आ गया जब मंडप में बीना को दुल्हन के रूप में देखकर दिलीप जी की आँखें खुशी से नम थी और वो मन ही मन इस बात से संतुष्ट थे कि अच्छा किया जो उन्होंने बीना की शादी का विज्ञापन बिना किसी की परवाह किये अखबार में दे दिया और आज वो अपनी बेटी बीना को दुल्हन के रूप में देख पा रहे हैं। मन ही मन उन्होंने शर्मा जी का भी धन्यवाद किया जो उन्होंने दिलीप जी को नयी राह दिखाई।




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


18-01-2022

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शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

हाथी के दाँत

 हाथी के दाँत




एक बड़े सम्मान समारोह में सुधा जी का नाम पुकारा जा रहा था। आज उन्हें सम्मानित किया जा रहा था उत्कृष्ट समाजसेवी के रूप में। बड़ा नाम था समाज में सुधा जी का । आये दिन अख़बार में उनकी तस्वीर छपती कि भूखे ग़रीब को भोजन कराया, ठंड में कम्बल वितरण किया, कभी किसी स्कूल में ड्रेस, स्वेटर और पुस्तक कॉपी बांटे तो कभी नंगे पैर चलने वाले मजदूरों को चप्पल वितरण किया, किसी अस्पताल जाकर बीमारों के बीच फल बांटे, किसी अनाथालय में दान किया तो कभी किसी वृद्धाश्रम में दान किया। सुधा जी के पति एक मल्टीनेशनल कंपनी में थे और आये दिन शहर के बाहर रहते। बच्चे भी अब बड़े हो चुके थे और अपनी दुनिया में व्यस्त थे। घर में बुजुर्ग सास- ससुर और सेवा के लिए आशा दीदी साथ रहती। सम्मान समारोह में मिले बड़े से सम्मान पत्रक और शॉल और ढेरों उपहार के साथ सुधा जी ने घर में प्रवेश किया। आशा दीदी भागती हुई सुधा जी के पास आई और कुछ कहना चाहा, "दीदी , वो गाँव से बेटी का फ़ोन आया है, बारहवीं सत्तर प्रतिशत से पास हुई है, अब आगे की पढ़ाई के लिए शहर आना चाहती है,आप कुछ मदद कर दें तो,,,  सुधा जी ने उसे टोकते हुए कहा,




 "अरी आशा, अभी तो आई हूँ, ज़रा साँस तो लेने दे, फिर कर लेना अपनी बात। और सुन लड़कियों को ज्यादा पढ़ाते नहीं, अब तो उसके हाथ पीले करने की सोच और उसे घर के काम सीखा, अच्छा एक काम कर यहीं बुला ले, मैं उसे अच्छे से घर के सारे काम सीखा दूंगी" कहते हुए सुधा जी ने कुछ सोचते हुए मुस्कुरा दिया।




"नहीं दीदी, बिटिया तो.... आशा कुछ कहती उससे पहले ही सुधा ने उसे झिडकते हुए कहा,जाओ अभी मेरे लिए बढ़िया अदरक की चाय लेकर आ , कहते हुए सुधा जी ने सारा सामान आशा को दिया और वहीं सोफे पर बैठ गईं।




 बहु को आया जानकर ससुर बसंत अपनी लाठी का सहारा लेते धीरे धीरे उनके पास आये और धीरे से बोले, 




"बेटा सुधा, मोतियाबिंद के कारण सब कुछ धुंधला दिख रहा है, और तकलीफ भी बहुत हो रही है, अगर मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो जाता तो थोड़ा आराम मिलता।" 




"क्या पिताजी, थोड़ी तकलीफ हुई नहीं कि आपको डॉक्टर के पास जाना है, अरे सयाने शरीर में तकलीफ तो होगी न , देखिये, अभी कुछ दिन मैं व्यस्त हूँ, अभी ठंड का समय है, मुझे काफी जगह कम्बल और स्वेटर वितरण के लिए भी जाना है, और कुछ सम्मान समारोह भी है। और इस महीने आपकी और माँ की दवाइयों पर भी काफी खर्च हुआ है। अब अगले महीने सोचेंगे।




बसंत के पास बोलने को कुछ नहीं था, वो मायूस होकर हाथ में पत्नी रमा की खाँसी की दवाई की खाली बोतल छिपाते वापस अपने कमरे की ओर जाने लगे। रमा ने भी कमरे से उन्हें चुप रहने का इशारा जो किया था। 




इधर आशा दीदी चाय बनाते अपनी बेटी के भविष्य के लिए चिंतित थी। उधर बसंत और रमा अपने कमरे में अपनी तकलीफ़ छिपाने की नाक़ाम कोशिश करते और सुधा जी हॉल में सोफे पर बैठी कभी अपने सम्मान पत्रक को देख खुश होती तो कभी मोबाइल पर सम्मान समारोह की तस्वीरें देख दम्भ से भर जाती।




तोषी गुप्ता


13-01-2022

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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

 कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन




कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन,


जब सखियों का साथ था,


उनके साथ हर लम्हा जानदार था,


वो घण्टों साथ मे गप्पें लड़ाना,


रूठना और मनाना साथ था,


बागों में तितलियों संग आंख मिचौली खेलते,


और फूलों की खुशबू का खुमार था,


वो बेफ़िक्र सी हंसी थी,


वो बेबाक़ अंदाज़े बयाँ था,


वो बारिश की बूंदों में भीगना,


वो मंद पवन की बयार में झूमना,


हवाओं संग उलझते लटों संग खेलना,


वो दुपट्टा लहरा के ख़ुद उसमें उलझ जाना,


रात में टिमटिमाते तारों को निहारना,


दूधिया रोशनी बिखेरते चाँद संग ढेरों बातें करना,


कभी दिए उजली लौ संग खेलना,


कभी आईने में खुद को देख शरमा जाना, 


औंधे मुँह बिस्तर पर लेटे,


अपनी डायरी के पन्ने भरना,


वो सबसे छिपकर अपने सपनों की दुनिया,


कागज़ पर उकेरना,


बहुत याद आते हैं वो दिन,


और हर पल ये ख़्वाहिश होती,


कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन,



तोषी गुप्ता

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