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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

कलम

कलम




जब जब कलम चलती है,


मन के भावों को,


कागज़ पर उतार देती है,


अनकहे उद्गारों को,


शब्दों से संवार देती है,


सच का साथ देती ये कलम,


असत्य की कमर तोड़ देती है,


आतताइयों का मुँह बंद कर,


सरल हृदय की ज़ुबाँ को आवाज़ देती है,


कम ना आँकना, कलम की इस ताक़त को,


ये वो धार है जो बिना वार किए,


रक्त की नदियाँ बहा देती है,


ये दो धारी तलवार है,


चाहे तो रंक को राजा,


और राजा को रंक बना देती है, 


माँ सरस्वती का वरदान है ये कलम,


चाहे तो सफलता के शिखर पर पहुँचा,


व्यक्ति का मान बढ़ा देती है,




तोषी गुप्ता

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भूखा गिद्ध

 भूखा गिद्ध 


कोरोना की भयावह स्थिति की रिपोर्टिंग करनी थी। जिसके लिए मैं एक अस्पताल जा पहुंचा। अस्पताल में जगह नहीं थी, लोगों को बेड नहीं मिल रहे थे, ऑक्सीज़न नहीं मिल रहा था, दवाइयाँ और इंजेक्शन नहीं मिल रहे थे। लोग अस्पताल के बाहर ही बरामदों में , कारों, ऑटो और रिक्शे में अपने रिश्तेदारों के एक- एक सांस के लिए जद्दोजहद करते दिख रहे थे। पास ही एक रिक्शेवाला खड़ा था जिसने अपने रिक्शे में एक तख़्ती लगा रखी थी, "कम कीमत पर मुक्तिधाम ले जाने की व्यवस्था" । साथ में उसकी बीवी जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा भूख से बिलखते हुए अपने हाथ के अंगूठे को चूस रहा था, और एक छोटी बच्ची जिसकी आंखों के आँसू अब सूख चुके थे जो कातर नज़रों से अपनी माँ को निहार रही थी। बरामदे में एक -एक सांस के लिए लड़ते एक व्यक्ति के पास ही खड़े थे तीनों। अभी-अभी डॉक्टर ने उसकी नहीं बचने की संभावना व्यक्त की थी। अचानक ही मुझे एक फोटोग्राफर की चर्चित फोटो की याद या गई जिसमें एक भूखा गिद्ध , भूख से बदहाल एक छोटे से बच्चे की मौत का इन्तज़ार कर रहा था, ताकि उस बच्चे की मौत के बाद उसका भक्षण कर अपनी भूख शांत कर सके। उस फोटो की जीवंतता आज मुझे उस अस्पताल के बरामदे में नज़र आ रही थी।


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रेंगता कीड़ा

 रेंगता कीड़ा


अनु महसूस कर रही थी, अपने शरीर पर  किसी की बदनीयत छुवन को, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर पर कोई गंदा कीड़ा रेंग रहा हो, बचपन से ना जाने कितनी ही बार वो अपने शरीर पर इन रेंगते कीड़ों को महसूस कर चुकी थी। बेशर्मों की तरह उनके मुस्कुराते चेहरे ऐसे लगते जैसे गाय के भेष में कोई भेड़िया हो। अचानक ही बस ड्राइवर ने ब्रेक लगाई और अनु बिजली की फुर्ती से उस रेंगते कीड़े पर झपट पड़ी, उसी तेजी से अनु के पीछे से आवाज़ आई , आssss अनु की पिछली सीट पर बैठा वो शख़्स अपनी टूटी उंगली पकड़ कर कराह रहा था, और आस-पास बैठे लोग उससे सहानुभूति दिखाते ड्राइवर पर चिल्ला उठे इतनी तेजी से ब्रेक लगाने के लिए। इधर अनु मुस्कुराते हुए बाहर के खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ़ उठा रही थी, निश्चिंतता से,,, क्योंकि अब उसके शरीर पर कोई कीड़ा नहीं रेंग रहा था।


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कल किसने देखा है

 कल किसने देखा है



हर एक पल की सांसों के साथ,


ज़िन्दगी गुजरती ही जा रही है,


जी लो इन पलों को जी भरकर,


ज़िन्दगी यूँ ही पिघलती जा रही है,




हंसी यादों के तिनके मुट्ठी में बंद करके,


सहेज कर इन्हें रख लेना ,


रहो जब भी तन्हा, खोल लेना इस मुट्ठी को, 


एक बार फिर दोबारा इन लम्हों को जी लेना ,




बंद कर लो गठरी बुरे अहसासों की,


कि बीते हुए वो लम्हें हर पल तुम्हें सतायेंगे


पड़ने न दो छाँव आज पर उस दर्द की,


कि नयी दास्ताँ से नये लम्हें हर नयी सुबह सजायेंगे,





क्यों करें कल की चिंता,


कि कल किसने देखा है,


जी लें जी भरकर आज में,


कि आज तो सबको जीना है,





सोचकर हर पल को आख़िरी,


जी लें कुछ इस तरह ज़िन्दगी,


हर ख्वाहिशें अपनी पूरी कर लें,


हर पल को मान लें पूरी ज़िन्दगी,





✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


12 जनवरी 2022

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शनिवार, 4 दिसंबर 2021

ख्वाहिशें



ख्वाहिशें 



अक़्सर अपने कमरे की खिड़की से,


बाहर आसमान को निहारते हुए,


खो सी जाती हूँ कहीं,


डूब सी जाती हूं,


अपने ख्वाहिशों के समंदर में,


वो ख्वाहिशें, 


जो सोचकर ही सुकून सा दे जाती हैं,


महसूस कर, जीने की नई उम्मीद दे जाती है,


दूर पहाड़ों की बस्ती में,


गहरी और शांत झील,


जैसे बहुत कुछ समाई हो खुद में,


किनारे पर रखी कुर्सी,


बरबस ही मुझे,


अपनी ओर खींचती,


जहाँ बैठ मैं खुद को संवार सकूँ,


खुद को पहचान सकूँ,


खुद से बातें कर, खुद को जान सकूँ,


इस गहरे शांत झील के हृदय में समाए रहस्य को,


सुलझा सकूँ,


दूर क्षितिज से आती रोशनी की किरणों की ऊर्जा को,


खुद में समा सकूँ,


पक्षियों के कलरव के संगीत को अपने जीवन में महसूस कर सकूं,


ठंडी बहती मादक बयार की छुवन को हमेशा के लिए साथ रख सकूँ,


फुरसत के इन पलों को सहेज कर रखना चाहती हूँ सदा के लिए,


इसलिए, नई उम्मीद, नए ख्वाहिशों को जीने,


हर रोज़ बरबस ही दौड़ी चली आती हूँ,


अपने कमरे की खिड़की की ओर,


अपनी नई ख्वाहिशों की ओर,,,,




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


3/12/21

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बुधवार, 24 नवंबर 2021

स्थानांतरण

 स्थानांतरण



निशांत फाइलों में उलझा हुआ था कि एक आवाज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया, "निशांत, कब तक इन फाइलों के बीच मुझसे छुपते रहोगे?" 


निशांत ने सर उठाया तो सामने काजल थी। "अरे काजल तुम, यहाँ कैसे?" 



"सारी बातें यहीं करोगे क्या? चलो चाय पीते हुए बातें करेंगे" काजल ने कहा,



और दोनों रेस्तरां की तरफ चल पड़े। आज बारह साल बाद निशांत और काजल की मुलाकात हुई थी। चाय पीते हुए वो एक दूसरे का हाल जानने लगे। बातों ही बातों में काजल ने उसे बताया कि अब वह इसी शहर में रहेगी और बड़ी मुश्किल से उसने निशांत के ऑफिस का पता लगाया और आज मिलने चली आई। काजल शुरू से बहुत महत्वाकांक्षी थी, इसी वजह से उसने शादी से ज्यादा महत्व अपने सपनों को पूरा करने में दिया। निशांत की शादी को बारह साल हो चुके थे उसका एक बेटा और एक बेटी थी। लेकिन निशांत ने महसूस किया कि निशांत की पारिवारिक जीवन जानने में काजल को कुछ खास दिलचस्पी नहीं थी। निशांत थोड़ा असहज भी था और काजल पहले की ही तरह बिल्कुल बिंदास। काजल ने बताया कि उसका तबादला इसी शहर में हुआ है। ये सुनकर निशांत पहले से भी ज्यादा असहज हो गया। चाय की चुस्कियां चल ही रही थी कि बारिश शुरू हो गई और निशांत अतीत में खो गया। रोज़ शाम को किसी रेस्तरां में चाय के बहाने वो घंटों एक दूसरे से बातें करते और जब कभी बारिश होती दोनों निशांत की बाइक में घूमने निकल जाते। रोज शाम साथ बिताना उनकी दिनचर्या में शामिल था। निशांत की दो छोटी बहनें थी। निशांत के घर वाले पहले निशांत की शादी करना चाहते थे ताकि भाभी के निर्देशन में दोनों छोटी बहनों की शादी अच्छे से हो सके। निशांत ने जब भी काजल से शादी की बात की उसने बात टाल दी कि उसे अभी अपने सपने पूरे करने हैं और वो किसी जिम्मेदारी में नहीं बंधना चाहती। और निशांत को अपनी जिम्मेदारी निभाने पूजा से शादी करनी पड़ी। इधर काजल आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गई। सुशील सुगढ़ पूजा ने आते ही निशांत का पूरा घर संभाल लिया और जल्दी ही निशांत के दिल मे जगह बना ली। निशांत भी अब धीरे धीरे काजल को बिल्कुल भूल चुका था और अपनी छोटी सी दुनिया में खुश था। बारिश थम चुकी थी। चाय खत्म करके निशांत ने बोला चलो तुम्हें छोड़ देता हूँ। निशांत अपनी कार में काजल को छोड़ने गया। काजल का घर आ चुका था। अचानक काजल  ने निशांत का हाथ थाम लिया, और पूछा, "सच सच बताओ, क्या तुम्हें मेरी ज़रा सी भी याद नहीं आती?" निशांत अब और भी असहज हो गया, लेकिन मुस्कुराते हुए कहा, "काजल देर हो रही है, अब तुम्हें जाना चाहिए" काजल आंखों में आँसू लिए कार से उतरकर जाने लगी। बिना एक पल भी गँवाए निशांत तेजी से ऑफिस पहुंचा और तुरंत अपने स्थानांतरण की अर्जी दे दी। अब निशांत सहज भाव से अपनी टेबल में रखे अपनी फैमिली फोटो को देखकर मुस्कुरा रहा था।





✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


23-11-2021

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मंगलवार, 23 नवंबर 2021

यादें,,

 यादें


यादों से ,


गहरा नाता है दिल का,


उन यादों में खो,


जी जाती हूँ,


एक बार फिर,


उन बीते लम्हों को,


जानती हूँ,


वो बीते लम्हे,


आज भी,


उतना ही दर्द देते हैं,


जितना कि,


तब देते थे,


जब उन्हें,


जी रही थी,


मानती हूँ,


भूल जाना ही अच्छा,


ऐसे दर्द देने वाली


यादों को,


पर क्या करूँ,


उन बीते लम्हों में


सुख-दुख का,


ऐसा ताना-बाना है कि,


हर तार उलझा हुआ है,


दूसरे कई तारों से,


याद कर खुशी का एक लम्हा,


मुस्कुरा देती हूँ फिर से,


दूसरे ही पल,


जुड़ जाता है ,


उस खुशी से जुड़ा,


दुःख का तार,


और मुस्कुराते हुए चेहरे पर,


सिकुड़ से जाते हैं होंठ,


अगले ही पल,


जुड़ जाता है दूसरा तार,


फिर से,


एक दूसरी खुशी से,


एक बार फिर उन लम्हों को जी,


खिल उठता है ये चेहरा,


और दिल को,


 एक सुकून मिलता है,


कि यादों के झरोखों से,


से खुशी और ग़म,


दोनों ही अपनी झलक दिखाएंगे,


बस कोशिश हमें करनी है,


कि भूल जाएं वो पल,


जो हमें तकलीफ़ देते हैं,


और जी लें एक बार फिर,


उन खुशी के लम्हों को,


जिन्हें दिल, 


बार-बार जीने की चाहत रखता है,


जो हमारे दिल को सुकून देता है,






✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


22/11/21


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