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बुधवार, 19 जनवरी 2022

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दिलीप जी बहुत परेशान रहते थे आज कल। दरअसल उनतीसवें वर्ष में प्रवेश कर गई थी उनकी बेटी बीना। दिलीप जी को बीना की शादी की चिंता सता रही थी। वैसे सर्वगुण सम्पन्न बीना सौम्य और सरल हृदया थी। बैंक की नौकरी भी थी। जो भी बीना से मिलता एक ही बार में उससे प्रभावित हो जाता। लेकिन शादी की बात आते ही लोग मना कर देते। कारण बीना के शरीर के अंदरूनी हिस्से में सफेद दाग़ के कुछ लक्षण थे। हालांकि कपड़े से ढक जाने के कारण बाहर से ना दिखते ना ही बिना बताए किसी को पता चलते। लेकिन बीना ने स्पष्ट तौर से घर में बता रखा था कि वो शादी करेगी तो सच्चाई बता कर करेगी। दिलीप जी और बीना की माँ भी बीना के इस फैसले से संतुष्ट थे। और यही वजह थी कि बीना की शादी कहीं तय नहीं हो पा रही थी।



एक सुबह दिलीप जी मॉर्निंग वॉक में अपने एक पुराने मित्र शर्मा जी से मिले। काफी दिनों बाद मिलने के कारण बातों का दौर चल निकला। और दिलीप जी ने बातों ही बातों में बीना की शादी के बारे में भी उनसे चर्चा की। शर्मा जी के बहुत पूछने पर दिलीप जी ने शादी ना हो पाने का कारण बताया। शर्मा जी अपनी बहन की शादी के दौरान इस पीड़ा से गुजर चुके थे। उन्होंने दिलीप जी को बिना परिवार और समाज की परवाह किये बीना की शादी का विज्ञापन अख़बार में देने की सलाह दी। और दिलीप जी को समझाया भी कि परिवार और समाज की परवाह करने से ज्यादा जरूरी बीना की शादी और सफल शादी शुदा ज़िन्दगी है। 



अब तक कशमकश से गुज़र रहे दिलीप जी को नई राह मिलते नज़र आई और दूसरे ही दिन उन्होंने सच्चाई बताते हुए बीना की शादी का विज्ञापन अख़बार में दे दिया।  कुछ दिनों बाद ही सुभाष का रिश्ता बीना के लिए आया । सुभाष के परिवार वाले भी सुभाष की शादी के लिए इसी समस्या से गुज़र रहे थे। सुभाष और बीना के परिवार वाले मिले। सुभाष भी उच्च शिक्षित और कॉलेज में प्रोफेसर था। सुभाष और बीना भी एक दूसरे से मिलकर खुश थे और दोनों ने विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी थी। 



और वो दिन भी आ गया जब मंडप में बीना को दुल्हन के रूप में देखकर दिलीप जी की आँखें खुशी से नम थी और वो मन ही मन इस बात से संतुष्ट थे कि अच्छा किया जो उन्होंने बीना की शादी का विज्ञापन बिना किसी की परवाह किये अखबार में दे दिया और आज वो अपनी बेटी बीना को दुल्हन के रूप में देख पा रहे हैं। मन ही मन उन्होंने शर्मा जी का भी धन्यवाद किया जो उन्होंने दिलीप जी को नयी राह दिखाई।




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


18-01-2022

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शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

हाथी के दाँत

 हाथी के दाँत




एक बड़े सम्मान समारोह में सुधा जी का नाम पुकारा जा रहा था। आज उन्हें सम्मानित किया जा रहा था उत्कृष्ट समाजसेवी के रूप में। बड़ा नाम था समाज में सुधा जी का । आये दिन अख़बार में उनकी तस्वीर छपती कि भूखे ग़रीब को भोजन कराया, ठंड में कम्बल वितरण किया, कभी किसी स्कूल में ड्रेस, स्वेटर और पुस्तक कॉपी बांटे तो कभी नंगे पैर चलने वाले मजदूरों को चप्पल वितरण किया, किसी अस्पताल जाकर बीमारों के बीच फल बांटे, किसी अनाथालय में दान किया तो कभी किसी वृद्धाश्रम में दान किया। सुधा जी के पति एक मल्टीनेशनल कंपनी में थे और आये दिन शहर के बाहर रहते। बच्चे भी अब बड़े हो चुके थे और अपनी दुनिया में व्यस्त थे। घर में बुजुर्ग सास- ससुर और सेवा के लिए आशा दीदी साथ रहती। सम्मान समारोह में मिले बड़े से सम्मान पत्रक और शॉल और ढेरों उपहार के साथ सुधा जी ने घर में प्रवेश किया। आशा दीदी भागती हुई सुधा जी के पास आई और कुछ कहना चाहा, "दीदी , वो गाँव से बेटी का फ़ोन आया है, बारहवीं सत्तर प्रतिशत से पास हुई है, अब आगे की पढ़ाई के लिए शहर आना चाहती है,आप कुछ मदद कर दें तो,,,  सुधा जी ने उसे टोकते हुए कहा,




 "अरी आशा, अभी तो आई हूँ, ज़रा साँस तो लेने दे, फिर कर लेना अपनी बात। और सुन लड़कियों को ज्यादा पढ़ाते नहीं, अब तो उसके हाथ पीले करने की सोच और उसे घर के काम सीखा, अच्छा एक काम कर यहीं बुला ले, मैं उसे अच्छे से घर के सारे काम सीखा दूंगी" कहते हुए सुधा जी ने कुछ सोचते हुए मुस्कुरा दिया।




"नहीं दीदी, बिटिया तो.... आशा कुछ कहती उससे पहले ही सुधा ने उसे झिडकते हुए कहा,जाओ अभी मेरे लिए बढ़िया अदरक की चाय लेकर आ , कहते हुए सुधा जी ने सारा सामान आशा को दिया और वहीं सोफे पर बैठ गईं।




 बहु को आया जानकर ससुर बसंत अपनी लाठी का सहारा लेते धीरे धीरे उनके पास आये और धीरे से बोले, 




"बेटा सुधा, मोतियाबिंद के कारण सब कुछ धुंधला दिख रहा है, और तकलीफ भी बहुत हो रही है, अगर मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो जाता तो थोड़ा आराम मिलता।" 




"क्या पिताजी, थोड़ी तकलीफ हुई नहीं कि आपको डॉक्टर के पास जाना है, अरे सयाने शरीर में तकलीफ तो होगी न , देखिये, अभी कुछ दिन मैं व्यस्त हूँ, अभी ठंड का समय है, मुझे काफी जगह कम्बल और स्वेटर वितरण के लिए भी जाना है, और कुछ सम्मान समारोह भी है। और इस महीने आपकी और माँ की दवाइयों पर भी काफी खर्च हुआ है। अब अगले महीने सोचेंगे।




बसंत के पास बोलने को कुछ नहीं था, वो मायूस होकर हाथ में पत्नी रमा की खाँसी की दवाई की खाली बोतल छिपाते वापस अपने कमरे की ओर जाने लगे। रमा ने भी कमरे से उन्हें चुप रहने का इशारा जो किया था। 




इधर आशा दीदी चाय बनाते अपनी बेटी के भविष्य के लिए चिंतित थी। उधर बसंत और रमा अपने कमरे में अपनी तकलीफ़ छिपाने की नाक़ाम कोशिश करते और सुधा जी हॉल में सोफे पर बैठी कभी अपने सम्मान पत्रक को देख खुश होती तो कभी मोबाइल पर सम्मान समारोह की तस्वीरें देख दम्भ से भर जाती।




तोषी गुप्ता


13-01-2022

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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

 कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन




कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन,


जब सखियों का साथ था,


उनके साथ हर लम्हा जानदार था,


वो घण्टों साथ मे गप्पें लड़ाना,


रूठना और मनाना साथ था,


बागों में तितलियों संग आंख मिचौली खेलते,


और फूलों की खुशबू का खुमार था,


वो बेफ़िक्र सी हंसी थी,


वो बेबाक़ अंदाज़े बयाँ था,


वो बारिश की बूंदों में भीगना,


वो मंद पवन की बयार में झूमना,


हवाओं संग उलझते लटों संग खेलना,


वो दुपट्टा लहरा के ख़ुद उसमें उलझ जाना,


रात में टिमटिमाते तारों को निहारना,


दूधिया रोशनी बिखेरते चाँद संग ढेरों बातें करना,


कभी दिए उजली लौ संग खेलना,


कभी आईने में खुद को देख शरमा जाना, 


औंधे मुँह बिस्तर पर लेटे,


अपनी डायरी के पन्ने भरना,


वो सबसे छिपकर अपने सपनों की दुनिया,


कागज़ पर उकेरना,


बहुत याद आते हैं वो दिन,


और हर पल ये ख़्वाहिश होती,


कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन,



तोषी गुप्ता

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कलम

कलम




जब जब कलम चलती है,


मन के भावों को,


कागज़ पर उतार देती है,


अनकहे उद्गारों को,


शब्दों से संवार देती है,


सच का साथ देती ये कलम,


असत्य की कमर तोड़ देती है,


आतताइयों का मुँह बंद कर,


सरल हृदय की ज़ुबाँ को आवाज़ देती है,


कम ना आँकना, कलम की इस ताक़त को,


ये वो धार है जो बिना वार किए,


रक्त की नदियाँ बहा देती है,


ये दो धारी तलवार है,


चाहे तो रंक को राजा,


और राजा को रंक बना देती है, 


माँ सरस्वती का वरदान है ये कलम,


चाहे तो सफलता के शिखर पर पहुँचा,


व्यक्ति का मान बढ़ा देती है,




तोषी गुप्ता

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भूखा गिद्ध

 भूखा गिद्ध 


कोरोना की भयावह स्थिति की रिपोर्टिंग करनी थी। जिसके लिए मैं एक अस्पताल जा पहुंचा। अस्पताल में जगह नहीं थी, लोगों को बेड नहीं मिल रहे थे, ऑक्सीज़न नहीं मिल रहा था, दवाइयाँ और इंजेक्शन नहीं मिल रहे थे। लोग अस्पताल के बाहर ही बरामदों में , कारों, ऑटो और रिक्शे में अपने रिश्तेदारों के एक- एक सांस के लिए जद्दोजहद करते दिख रहे थे। पास ही एक रिक्शेवाला खड़ा था जिसने अपने रिक्शे में एक तख़्ती लगा रखी थी, "कम कीमत पर मुक्तिधाम ले जाने की व्यवस्था" । साथ में उसकी बीवी जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा भूख से बिलखते हुए अपने हाथ के अंगूठे को चूस रहा था, और एक छोटी बच्ची जिसकी आंखों के आँसू अब सूख चुके थे जो कातर नज़रों से अपनी माँ को निहार रही थी। बरामदे में एक -एक सांस के लिए लड़ते एक व्यक्ति के पास ही खड़े थे तीनों। अभी-अभी डॉक्टर ने उसकी नहीं बचने की संभावना व्यक्त की थी। अचानक ही मुझे एक फोटोग्राफर की चर्चित फोटो की याद या गई जिसमें एक भूखा गिद्ध , भूख से बदहाल एक छोटे से बच्चे की मौत का इन्तज़ार कर रहा था, ताकि उस बच्चे की मौत के बाद उसका भक्षण कर अपनी भूख शांत कर सके। उस फोटो की जीवंतता आज मुझे उस अस्पताल के बरामदे में नज़र आ रही थी।


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रेंगता कीड़ा

 रेंगता कीड़ा


अनु महसूस कर रही थी, अपने शरीर पर  किसी की बदनीयत छुवन को, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर पर कोई गंदा कीड़ा रेंग रहा हो, बचपन से ना जाने कितनी ही बार वो अपने शरीर पर इन रेंगते कीड़ों को महसूस कर चुकी थी। बेशर्मों की तरह उनके मुस्कुराते चेहरे ऐसे लगते जैसे गाय के भेष में कोई भेड़िया हो। अचानक ही बस ड्राइवर ने ब्रेक लगाई और अनु बिजली की फुर्ती से उस रेंगते कीड़े पर झपट पड़ी, उसी तेजी से अनु के पीछे से आवाज़ आई , आssss अनु की पिछली सीट पर बैठा वो शख़्स अपनी टूटी उंगली पकड़ कर कराह रहा था, और आस-पास बैठे लोग उससे सहानुभूति दिखाते ड्राइवर पर चिल्ला उठे इतनी तेजी से ब्रेक लगाने के लिए। इधर अनु मुस्कुराते हुए बाहर के खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ़ उठा रही थी, निश्चिंतता से,,, क्योंकि अब उसके शरीर पर कोई कीड़ा नहीं रेंग रहा था।


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कल किसने देखा है

 कल किसने देखा है



हर एक पल की सांसों के साथ,


ज़िन्दगी गुजरती ही जा रही है,


जी लो इन पलों को जी भरकर,


ज़िन्दगी यूँ ही पिघलती जा रही है,




हंसी यादों के तिनके मुट्ठी में बंद करके,


सहेज कर इन्हें रख लेना ,


रहो जब भी तन्हा, खोल लेना इस मुट्ठी को, 


एक बार फिर दोबारा इन लम्हों को जी लेना ,




बंद कर लो गठरी बुरे अहसासों की,


कि बीते हुए वो लम्हें हर पल तुम्हें सतायेंगे


पड़ने न दो छाँव आज पर उस दर्द की,


कि नयी दास्ताँ से नये लम्हें हर नयी सुबह सजायेंगे,





क्यों करें कल की चिंता,


कि कल किसने देखा है,


जी लें जी भरकर आज में,


कि आज तो सबको जीना है,





सोचकर हर पल को आख़िरी,


जी लें कुछ इस तरह ज़िन्दगी,


हर ख्वाहिशें अपनी पूरी कर लें,


हर पल को मान लें पूरी ज़िन्दगी,





✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻


12 जनवरी 2022

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