toshi

apne vajood ki talash me.........
Related Posts with Thumbnails

रविवार, 14 नवंबर 2010

" मोना स्कूल की राज्य स्तरीय उपलब्धि "

नेशनल साइंस ड्रामा फेस्टिवल के लिए एक बार फिर छ.ग. से मोना माडर्न स्कूल,सारंगढ़ का चयन.नेहरु साइंस सेंटर, मुबई में आयोजित इस कॉम्पिटिशन में पहले भी मोना स्कूल का चयन २००८-२००९ में हो चूका हे जिसमे राष्ट्रिय स्तर पर स्कूल को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था.इस बार भी नेशनल साइंस ड्रामा फेस्टिवल , नेहरू साइंसे सेंटर ,मुंबई में आयिजित है.जिसमे पश्चिम भारत के अन्य राज्यों के साथ छ. ग. का प्रतिनिधित्व करते हुए मोना माडर्न हा. से. स्कूल सारंगढ़ , इस प्रतियोगिता में अपनी मजबूत दावेदारी पेश करेगी 

Read more...

गुरुवार, 6 मई 2010

" ये सब सिर्फ वीरान है "


आप में ही कलाकार,
मै एक फनकार,
पर दिल है उदास,
देखकर ये झगडे, दंगे और फसाद,
कोई किसी का अपना कंहा,
तुम अपने में, मैं  अपने में जंहा,
मांगने से कुछ मिलता कंहा,
कुछ मिलता तो कुछ खोता जंहा,
देखो दुनिया की कैसी ये रीत हैं,
हर आदमी को किसी न किसी तरह,हर चीज़ से प्रीत है,
प्रकृति की सुन्दर वादियों से,
कवि की सुन्दर कल्पनाओं से,
हम सब जुड़े हैं एक रिश्तों से,
पर इनमें हैं कितनी दूरियां ,
कुछ मनचली , कुछ चंचली, कुछ खामोशियाँ,
इन नाजुक रिश्तों को प्यार की तलाश हैं,
कुछ मेरी , कुछ आपकी लम्बी दास्ताँ है,
इनमें अपनों को ढूंढा तो पाया,
" ये सब सिर्फ वीरान है "

Read more...

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

इरादे आजमाती मुश्किलें




"मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं ,
स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,
हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर,
ठोकरें इंसान को जीना सिखाती हैं" 


                                     आज बारहवी का रिजल्ट निकलने वाला है..........मन के किसी कोने में एक डर समाया हुआ है कि कल के पेपर में ना जाने क्या पढने को मिले, कारण............ परीक्षाफल निकलने के साथ ही अख़बारों में हर साल कुछ केस पढने को मिल ही जाते हैं कि फलां ने फेल होने पर फंसी लगा ली या फिर फेल होने के डर से किसी ने आत्महत्या कर ली या आत्महत्या का प्रयास किया या घर से भाग गया. एक बात मेरी समझ से परे है कि न्यू  जेनरेशन के ये बच्चे इतने प्रतिभावान और समझदार होते हुए भी इतनी नासमझी की हरकत क्यों और कैसे कर बैठते हैं? और ये भी कि ये ऊर्जावान पीढ़ी इतनी निराशाजनक कब से हो गई?

                                      विद्यार्थियों की इस प्रवृत्ति के पीछे जितना जिम्मेदार वह स्वयं है, उतने उसके माता-पिता या शिक्षक भी हैं. आजकल पेरेंट्स अपने बच्चो से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखते हैं कि किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को वे अपने परिचितों के बच्चो से किसी भी मायने में कमतर नहीं देख सकते उसी तह शिक्षकों का दोहरा दबाव इस कॉम्पिटिशन के युग में एक विद्यार्थी की मनः स्थिति में क्या प्रभाव डालता होगा इसका आंकलन आप स्वयं कर सकते हैं.
                                       
                                        सभी अपना एक लक्ष्य निर्धारित करके रखते हैं. माना कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो गया तो ऐसा भी तो नहीं कि वह और किसी लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकता. यदि एक छात्र इंजीनियरिंग की परीक्षा में असफल होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो यह उसकी बेवकूफी होगी कारण कि वह अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिये अपना भविष्य बना सकता है 

                                         असफलता का समाधान स्वयं को नुकसान पहुचाना तो नहीं होता और ये भी ज़रूरी नहीं कि एक बार की असफलता हमेशा की असफलता हो.कोशिश करने से तो ज़टिल से ज़टिल कार्य भी पूरा हो जाता है, फिर निर्धारित लक्ष्य क्यों प्राप्त नहीं किया जा सकता..................
  
"कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों..................."

Read more...

रविवार, 7 मार्च 2010

८ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष....

औरत.......... तुम  फिर से बनोगी दासी ............... अरविन्द झा जी का ये लेख पढ़ा तो कई विचार मन में आने लगे उसके कुछ अंश यंहा प्रस्तुत है... लेकिन सबसे पहले....

एक कटु सत्य से नारी को आगाह करने के लिए अरविन्द झा जी को धन्यवाद्...
लेकिन उनके लेख पर क्षमा जी कि दी इस टिप्पणी से भी मै पूरी तरह सहमत हू ............

 Naaree to aajbhi daasee hee hai! Aisi aurtonki sankhya aajbhi adhik hai,jo pashvi atyacharon se dam tod deti hain...
.
एक ओर जंहा देश की बागडोर प्रतिभा पाटिल जैसी सशक्त महिला के हाथो  में है  वंही दहेज़ प्रताड़ना , टोनही प्रताड़ना , भ्रूण हत्या , यौन शोषण जैसी न जाने कितनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष यातनाओ से उसे रोज गुजरना होता है , यह सच है कि  झूठे दहेज और प्रताडना की शिकायतें दर्ज करवाई जाती है और कई मामले में यह सच भी होती है... लेकिन किसी ने यह जानने कि कोशिश कि , कि उक्त महिला ने झूटी रिपोर्ट दर्ज क्यों करवाई...निश्चित रूप से कई प्रताड़नाये  ऐसी होती है जिसे कोई भी महिला चाहते हुए भी सबके सामने कभी नहीं लाना चाहती ... जिसका कारन सिर्फ  यही हो सकता  है कि आज  महिला अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है...

देश में लगातार प्रति पुरुष महिलाओ का प्रतिशत कम होता जा रहा है लेकिन इसकी जिम्मेदार महिलाये कैसे है ये मै नहीं जानती हां इतना ज़रूर जानती हू कि "घरो में भी रैगिंग होती है " जिसका परिणाम होता है एक बहु कि दयनीय स्थिति . और भ्रूण हत्या जैसा कदम कोई महिला "एक भावी महिला " को शायद उस दयनीय स्थिति से बचाने के लिए ही कर सकती  है और एक औरत जो स्वयं एक माँ है , बेटी है ,बहन है , पत्नी है उसके लिए भ्रूण हत्या जैसा क्रूर कदम उठाने का कारन ज़रूर कोई बहुत बड़ी मजबूरी होती है या उसका पत्थर दिल जिसे पत्थर बनाने में समाज के एक  वर्ग का बहुत बड़ा हाथ है ,  और निश्चित रूप से भ्रूण  हत्या का जिम्मेदार वो महिला नहीं बल्कि वो  वर्ग  है जो कि महिलाओ कि दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार  है . आज भी  वारिस  चाहत में कई पुरुष महिलाओ को केवल एक फैक्ट्री से ज्यादा कुछ नहीं समझते ..............

रही बात वेश्यावृत्ति के महिलाओ के बढ़ावा देने के बारे में तो किसी भी महिला के लिए उसकी इज्जत क्या होती है ये एक महिला से ज्यादा कोई नहीं समझ नहीं सकता क्योकि आज हर रिश्ता कटघरे में खड़ा है जंहा हर रिश्ते में एक औरत कि इज्जत तार - तार हुई है...और कोई भी महिला अपनी ख़ुशी से कभी भी इस धंधे में नहीं आती यह बात सव्रेक्षण में सामने आ चुकी है .फिर  एक बार अपनी ईज्जत खोई महिला का हाथ जब उसके अपने और  इस समाज के बुध्हिजिवी वर्ग का कोई भी पुरुष नहीं थामना चाहता ऐसी स्थिति में .....जब "पेट कि खातिर " एक पुरुष का इमान डगमगा जाता है तो समाज अकेली औरत को दोष क्यों देती है......और फिर विक्षिप्त  महिलाओ के बारे में आप क्या राय देना चाहेंगे जो सड़क के किनारे अपने बच्चे  के साथ लावारिस सी रहती है क्या उस विक्षिप्त के माँ बनाने  का कारन भी वो स्वयं है ........?

यह सच है कि कुछ महिलाओ ने उनको मिले अधिकारों का दुरूपयोग किया है लेकिन मेरा मानना है कि भगवान ने इस दुनिया में हमेशा बुरे लोगो से ज्यादा अच्छे लोंगो का प्रतिशत रखा है और उन महिलाओ को भी ज़रूर सबक मिलेगा जिन्होंने उन्हें मिले अधिकारों को हथियार कि तरह प्रयोग किया है ,लेकिन इन अधिकारों की, पीड़ित महिलाओ को बहुत ज़रूरत है क्योंकि इनके आभाव में वो दासी से भी नारकीय जीवन बिताने में मजबूर है .आज इतने अधिकारों के होने के बाद भी महिलाओ कि स्थिति समाज में अच्छी नहीं मानी जा सकती हां कुछ जागरूक लोग ज़रूर सर्वसुविधायुक्त  एसी कमरे में बैठकर महिलाओ कि अच्छी स्थिति का वर्णन करे पर में उन्हें सलाह देना चाहूंगी कि महिलाओ वास्तविक स्थिति जानने के लिए वो ऐसी ज़गहो का दौरा करे जंहा महिलाये अप्रत्यक्ष रूप से अभी भी कैद है और दासी का जीवन जीने मजबूर है...और ये बात मै अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिख रही हू...................................

आज पुरुष वर्ग और नारी वर्ग को एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप न करके दोनों को साथ मिलकर नारी उत्थान कि ओर कार्य करना होगा.पहले मेरा मानना था कि समाज में नारी कि स्थिति को मजबूत बनाने के लिए नारी को ही आगे आना होगा लेकिन अब मेरा ये मानना है कि समाज में नारी कि स्थिति सुधारने के लिए जितना महिलाओ को जागरूक होना ज़रूरी है उससे कही ज्यादा पुरुषो कि जागरूकता ज़रूरी है ..........

Read more...

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

होली की शुभकामनाये....

रंगों का त्यौहार है होली........
न जाने कितने रंग समाये है होली के इन रंगों में....
पर मेने सुना है सबसे खुबसूरत रंग तो प्यार का होता है.........
अपनेपन और विश्वास का होता है..........
सच्चाई और इमानदारी का होता है........
क्यों न खो जाये होली के संग..........
जीवन के इन पक्के रंगों में........
बांध ले अपनों को एक अटूट बंधन में..........
और लगाए किसी ऐसे के मस्तक  पर  तिलक...
जिनके बेरंग जीवन में नहीं है किसी अपने का रंग...
देकर उनको ये अनमोल तोहफा...
देखे तो सही अपने जीवन में रंगों का मज़ा...


Read more...

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

मै प्रतिदान नहीं,अपने दिए का सम्मान चाहती हूँ

" वेलेंटाइन डे " पर ख़ास....

मै अनुभव करती हूँ ,
"तुमसे चाहना "
"तुम्हे चाहने' से
कितना भिन्न है ...

अच्छा हो ,
अगर तुम भी
अंतर कर सको
"मुझ से चाहने "
और "मुझे चाहने "
के बीच....

मै प्रतिदान नहीं चाहती,
केवल अपने दिए का
सम्मान  चाहती हू....

संकलन 
'युग्म" से.........

Read more...

आखिर वेलेंटाइन डे का विरोध क्यों........?

पिछले दिनों मेने सुना कि देश में एक नया मुद्दा जोर पकड़ते जा रहा है ...वेलेंटाइन डे के विरोध का ....कुछ लोग जो स्वयं को भारतीय संस्कृति का ठेकेदार(?) बता रहे थे  इस प्रेम  दिवस के विरोध में चेतावनी दे रहे थे इस दिवस को सेलिब्रेट नहीं करने के लिए......इसके अलावा  पिछले कुछ दिनों से स्क्रैप, एस एम एस  के ज़रिये मुझे कुछ विशेष दिनों जैसे कि स्माइल डे , प्रपोज़ डे, चाकलेट डे, टेडी डे, प्रोमिस डे,व्हाइट शर्ट डे  और पता नहीं क्या - क्या " डे"  सेलेब्रेशन के बारे में पता चला....
लोंगो ने मुझे विश किया और मेने भी औरो के देखा देखी अपने कुछ मित्रो को विश किया.....अब तक तो मेने मदर्स डे , फादर्स डे, फ्रेंडशिप डे, रोज़ डे आदी के बारे में ही सुना था लेकिन इन " डे ' के बारे में जानकारी नहीं थी..

मेने इन विरोधकर्ताओ से ये भी सुना कि ये वेलेंटाइन डे  विदेश से आयातित संस्कृति है और यही कारन है कि वो लोग इस प्रेम दिवस का विरोध कर रहे है, मुझे लगा कि शायद इन लोंगो को न्यू इयर सेलेब्रेशन के बारे में नहीं मालूम जिसका  भारत देश में बहुत जोर शोर से आयोजन होता है, या उनकी परिभाषा ब्रिटेन के झंडे तले बदल जाती है ....

समाचार पत्रों में तरह - तरह की चेतावनी, रैली , तोड़ - फोड़ , या प्रेमी युगलों के साथ दुर्व्यवहार शायद  उन धर्म के ठेकेदारों  के अनुसार भारतीय संस्कृति  का परिचायक हो. वर्ष भर विदेश आयातित संस्कृति के पालनकर्ता वेलेंटाइन डे के विरोध में  पहली लाइन में खड़े नज़र आते है..लेकिन १९०६ में हुए स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन की तुलना में  आज का वेलेंटाइन डे का विरोध क्यों अधिक लोकप्रिय नहीं हो सका शायद  इसका जवाब वो धर्म के ठेकेदार बखूबी जानते हो....

 भारत में किसी भी त्यौहार को मानाने के पीछे धार्मिक भावनाए छिपी रहती है लेकिन पश्चात्य आयातित इस संस्कृति में धार्मिक तो नहीं लेकिन मानवीय भावनाए ज़रूर छिपी हुई है . एक ऐसी भावना  जो प्रेम और शांति का प्रतीक है .कोई भी चीज़ अच्छी या बुरी नहीं होती बल्कि उसे देखने का नजरिया अच्छा या बुरा हो सकता है उसी तरह वेलेंटाइन डे का औचित्य बुरा नहीं ,अपितु इसकी  आड़ में की जा रही अश्लीलता और भौंडापन बुरा है .भले ही इस त्यौहार में पाश्चात्य की झलक हो लेकिन इसी भारतीय संस्कृति के रक्षक , हमारे बुजुर्गो ने इसे अपना कर युवा पीढ़ी को भटकने से बचने एक नया सन्देश दिया  है जिनका इशारा ये विरोधकर्ता नहीं समझ रहे है . समाचार पत्रों के माध्यम से ही पता चला कि बुजुर्गो के  विभिन्न संस्थाओ ने,और कई महिला संगठनो ने अपने अपने तरीके से इस प्रेम दिवस को बहुत ही शालीन रूप में अपनाया है . क्या ये शालीनता सिर्फ बुजुर्गो में है? में समझती हू आज कि युवा पीढ़ी इतनी भी गैर जिम्मेदार नहीं कि उन्हें अच्छे या बुरे का भान ना हो. और वो किसी पाश्चात्य संस्कृति  को भारतीय  संस्कृति के अनुरूप शालीनता से ना अपना सके .

आधुनिकता की होड़ में अपनी संस्कृति से परे हटकर भेडचाल की संस्कृति अपनाना सही नहीं होता .इसलिए दूसरो की गलत चीजों की नक़ल न करते हुए  और "वेलेंटाइन डे " को भारतीय परिवेश में सजाते हुए हमारे बुजुर्गो ने युवा पीढ़ी को एक नयी राह दिखाई है . .मुझे मेरे दादाजी की कही एक बात याद आती है.."की यदि हमारे दुश्मन में भी कोई अच्छे गुण है तो हमें उनका अनुसरण करना चाहिए." क्यों ना हम "वेलेंटाइन डे" को भारतीय परिवेश में सजाते हुए कोई ऐसा उदाहरण दुनिया के सामने प्रस्तुत करे जिससे कि दुनिया के सभी  लोग इस दिन को भारतीय तरीके से अपनाने को मजबूर हो जाये और प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार चारो ओर प्रेम और शांति कि खुशबू  बिखेरे...

 "तोषी"........(मुस्कान)


Read more...

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP