इरादे आजमाती मुश्किलें
अपने वजूद की तलाश में...........
औरत.......... तुम फिर से बनोगी दासी ............... अरविन्द झा जी का ये लेख पढ़ा तो कई विचार मन में आने लगे उसके कुछ अंश यंहा प्रस्तुत है... लेकिन सबसे पहले....
एक कटु सत्य से नारी को आगाह करने के लिए अरविन्द झा जी को धन्यवाद्...
लेकिन उनके लेख पर क्षमा जी कि दी इस टिप्पणी से भी मै पूरी तरह सहमत हू ............
घटना १ - २ जनवरी रायगढ़ जिले के दानसरा नामक गाव में सड़क हादसे में ट्रक से एक व्यक्ति की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ द्वारा ४ अन्य ट्रक आग के हवाले कर दिया गया.साथ ही २ प्राइवेट कारो को भी नुकसान पहुचाने की कोशिश की गई....
घटना -२- ३१ जनवरी को जांजगीर- चांपा जिले के चंद्रपुर में सड़क हादसे में एक व्यक्ति की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने १० वाहन फूंक दिए साथ ही मौके का फायदा उठाते हुए देशी विदेशी शराब की दुकानों में लूट पाट कर करीब ३ लाख रूपये उड़ा लिए...
घटना-३- ३१ जनवरी दुर्ग जिले के धमधा में एक ट्रक की चपेट में आने से ५ साल की बच्ची की मौत के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने ट्रक चालक की जमकर पिटाई कर ट्रक में आग लगा दी...
घटना-४- २ फरवरी राउरकेला में एक स्कूल बस से एक छात्र की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने बस में आग लगा दी...
उपरोक्त सभी घटनाये दुखद ज़रूर है पर कंही न कंही सभी घटनाओं में लापरवाही पूर्वक वाहन चलाने की धृष्टता भी नज़र आ रही है . लेकिन ये सभी घटनाये उस बेकाबू होती भीड़ की ओर इशारा कर रही है जिस पर उस अप्रिय घटना के बाद काबू नहीं पाया जा सका और एक अप्रिय घटना के घटित होने के फलस्वरूप कई अप्रिय घटनाओ का जन्म हुआ . ऐसी घटनाये आये दिन आपको न्यूज़ पेपर में पढने को मिल जायेंगे जिसमे किसी घटनाक्रम से गुस्साए लोंगो द्वारा क़ानून तोडा गया हो . पर इस बेकाबू होती भीड़ पर बिना किसी अप्रिय घटना को अंजाम दिए काबू पाने की न्यूज़ आपको किसी न्यूज़ पेपर में नहीं मिलेगी कारन उस बेकाबू होती भीड़ पर किसी का काबू नहीं होता ......
अब सवाल यह उठता है कि इस भीड़ में इतना आक्रोश ,इतनी नफरत , इतनी हिंसा आखिर आई कहा से....
जब हम कोई अखबार पढ़ रहे होते है तो देश कि गौरव गाथा कहने वाले, जनरल नालेज वाले,वैजानिक तर्कों आदि की खबरे कम और नकारात्मक सोच देने वाली खबरे ज्यादा होंगी. इसी तरह इलेक्ट्रानिक मीडिया, जो नकारात्मक, हिंसक और घटिया बातो को लगातार रात- दिन अपने चैनल पर दर्शको को ऐसा मसालेदार तड़का लगाकर परोसता है जिसमे आम दर्शक सिर्फ ये आस लेकर बैठा रहता है कि अब आगे क्या होगा..लेकिन समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जो इन समाचार चैनलों को जानकारी का सबसे सही जरिया मानकर अपना अधिकांश वक्त लगाते है उस वर्ग पर ऐसे घातक न्यूज़ का क्या असर पड़ता होगा वो इस बात से अनजान रहते है या अनजान बने रहने का झूठा दिखावा करते है. टी.आर.पी. की अंधी दौड़ में शामिल और गलाकाट आपसी मुकाबले में लगे इन न्यूज़ चैनलों का नैतिक मूल्यों से आखिर क्या सरोकार...? और ऐसे माहौल में दर्शको या पाठको की सोच को सरोकारविहीन , गैर जिम्मेदार और लापरवाह होने से कैसे बचाया जा सकता है...?
हालाँकि इस बेकाबू होती भीड़ का पूरा जिम्मेदार सिर्फ मीडिया को ठहराना गलत होगा लेकिन फिर भी मेरा मानना यही है कि जब रात-दिन मीडिया दुनिया भर कि नफरत और हिंसा दिखने पर आमादा हो तो इंसानी सोच पर उसका असर पड़ना तो तय है...
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