toshi

apne vajood ki talash me.........
Related Posts with Thumbnails

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

मीडिया में नारी शोषण ....................

नारी कुदरत क़ी बनाई अनिवार्य रचना है ,जिसके उत्थान हेतु समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने सतत संघर्ष किया है। आज क़ी बहुमुखी प्रतिभाशील नारी उसी सतत प्रयास का परिणाम है। आज नारी ने हर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम किया है, चाहे वह शासकीय क्षेत्र हो या सामाजिक, घर हो या कोर्ट कचहरी , डाक्टर, इंजिनीयर, अथवा सेना का क्षेत्र, जो क्षेत्र पहले सिर्फ पुरुषो के आधिपत्य माने जाते थे, उनमे स्त्रियों क़ी भागीदारी प्रशंसा का विषय है। इसी तरह प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी स्त्रीयों क़ी भागीदारी से अछूता नहीं है ।
प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया समाज के दर्पण होते है, जिसमे समाज अपना अक्श देखकर आत्मावलोकन कर सकता है । पिछले कई वर्षो से मीडिया में नारी क़ी भूमिका सोचनीय होती जा रही है। आज प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया जिस तरह नारी क़ी अस्मिता को भुना रहा है, वह जाने - अनजाने समाज को एक अंतहीन गर्त क़ी ओर धकेलते जा रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है क़ी आज नारी ऊँचे से ऊँचे ओहदे या प्रोफेशन में कार्यरत क्यों ना हो वह सदैव एक अनजाने भय से ग्रसित रहती है। क्या है ये अनजाना भय ? निश्चित रूप से यह केवल उसके नारी होने का भय है जो हर समय उसे असुरक्षित होने का अहसास दिलाता रहता है। आलम यह है क़ी आज नारी घर क़ी चारदीवारी में भी अपनी अस्मिता बचने में अक्षम है।
प्रारंभ में प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया धार्मिक, सात्विक संदेशो द्वारा समाज को सही मार्गदर्शन देने का आधार था , लेकिन धीरे - धीरे उसका भी व्यवसायीकरण हो गया और झूठी लोकप्रियता भुनाने वह समाज के पथप्रेरक के रूप में कम और पथभ्रमित करने के माध्यम के रूप में अधिक नज़र आने लगा। शुरुआत हम छोटे परदे से करते है, जहा लगभग हर सीरीयल मे मानवीय संबंधो के आदर्श रूप को नकारते हुए नारी को एक ऐसी " वस्तु " के रूप में दर्शको के सामने परोसा जाता है, जंहा वह केवल एक भोग्या मात्र ही दिखाई जाती है। हर दूसरा सीरीयल नारी के पूज्यनीय चरित्र क़ी धज्जिया उडाता हुआ नज़र आता है। एक नारी पात्र ही दूसरी नारी पात्र पर शोषण और अत्याचार करती हुई नज़र आती है। नारी के विकृत रूप को दिखाने क़ी रही सही कसर एक ख्याति प्राप्त निर्देशिका के डेली सोप सीरीयलों ने पूरी कर दी जिसने रिश्तो क़ी सभी मर्यादाए तोड़ दी और कितने आश्चर्य क़ी बात है कि यही सब सीरीयल काउंट डाउन शो में अपनी सफलता के परचम गाड़ते हुए टाप नम्बरों पर होते है।
इसी तरह यदि हम विभिन्न विज्ञापनों कि बात करे तो विज्ञापनों ने तो हमारी संस्कृति कि सीमा ही लाँघ दी। विज्ञापनों में नारी कि भूमिका कंही से भी विकृत नहीं बशर्ते कि उससे समाज को अच्छा सन्देश मिले लेकिन विज्ञापनों में नारी के नग्न रूप का प्रदर्शन समाज में नारी के प्रति आकर्षण नहीं बल्कि विकर्षण पैदा करता है । अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा विज्ञापन समाज में गन्दी मानसिकता पनपने पर जोर देता है ओर सामाजिक अपराधो को बल मिलता है। बलात्कार, महिला शोषण, यौन शोषण आदि सब इसी विकर्षण का नतीजा है। अधिकतर विज्ञापनों में नारी देह प्रदर्शन ही देखने को मिलता है। किसी ने तर्क के आधार पर यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि देह प्रदर्शन के कारन बाजार में कोई वस्तु बिकती है या अपनी गुणवत्ता के कारन। किसी वस्तु को विज्ञापनों में देह प्रदर्शन के बिना प्रदर्शित किया जाये तो उसकी बिक्री कम होगी या नहीं होगी ऐसा कोई तर्क स्वीकार्य नहीं है। कितने अफ़सोस कि बात है कि आज किसी वस्तु के प्रचार - प्रसार के लिए एक नारी को किसी वस्तु कि तरह उपयोग किया जा रहा है।
फिल्मो ने तो नारी देह के प्रदर्शन में सभी को पीछे छोड़ दिया , जंहा अभिनेत्रिया आपत्तिजनक अंगप्रदर्शन और दृश्य करने के बाद यह कहकर पल्ला झाड लेती है कि फला सीन में कोई बुराई नहीं है और यह तो फिल्म कि मांग और सिचुएशन के अनुरूप है। इससे शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है जब स्वयं नारी ही एक अनुचित प्रदर्शन को लेकर इस तरह का तर्क प्रस्तुत करे। " क्या कूल है हम..." "गरम - मसाला" , नो एंट्री जैसी घटिया कॉमेडी फिल्मे दर्शको के सामने परोसकर निर्माता - निर्देशक समाज को कौन सी दिशा देना चाहते है ये मेरी समझ से परे है । और उसके बाद निर्माता - निर्देशकों द्वारा यह टिपण्णी किया जाना कि ऐसी फिल्मे आज के दर्शको कि डिमांड है और यंग जेनरेशन के अनुरूप है, बहुत ही हास्यास्पद लगता है। निश्चित रूप से ये फिल्मे जो "ऐ " सर्टिफिकेट नहीं है (?) पुरे परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकती है बशर्ते कि पूरा परिवार अलग -अलग कमरों में बैठकर फिल्मे देख रहा हो। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी देह के प्रदर्शन से फैलती गन्दी मानसिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की छात्रा का आपत्तिजनक एम् एम् एस किसी वायरस कि भाति लोकप्रिय (?) हो गया और इंदौर के किसी कालेज की लडकियों कि आपत्तिजनक तस्वीरे किसी "विशेष" इंटरनेट साईट पर देखी गई , जिससे लडकिया पूरी तरह अनजान थी। इस बढ़ते साईबर क्राइम का जिम्मेदार कौन है ?
माना कि नारी सुन्दरता का प्रतीक है , और सुन्दर दृश्य मन को प्रफुल्लित करता है, परन्तु जब इस सौंदर्य कि सीमा लांघी जाती है, तो वही उसके बुरे स्वरुप का परिचायक बन जाता है। किसी भी देश और समाज कि उन्नति तभी संभव है , जब उस देश की, उस समाज की नारी का वंहा सम्मान हो। आज प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी कि भूमिका में पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है । हमें पाश्चात्य सभ्यता एवं वातावरण का अनुकरण ना करके समाज को भारतीय संस्कृति की ओर लौटने के लिए प्रेरित करना होगा । भोगवादी प्रवृत्ति को समाप्त करके ऐसा वातावरण बनाना होगा जंहा नारी को पूर्ववत आदर एवं सम्मान मिले। आज के इस भोगवादी समाज में नारी सम्मान के अपमान कि धृष्टता करने वालो को यह बताने कि आवश्यकता है कि नारी केवल सहनशीलता और त्याग कि मूर्ती नहीं है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर वह अपने ऊपर होने वाले अन्याय का मुहतोड़ जवाब देकर आत्मविश्वास के साथ सुखपूर्वक जीवन बिता सकती है।
सबसे अहम् बात यह है कि प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी कि भूमिका में बदलाव लाने के लिए पहला कदम स्वयं नारियों को ही उठाना होगा तभी यह सुधारवादी आन्दोलन सफलता प्राप्त करेगा और एक स्वस्थ और सुखी समाज कि कल्पना कि जा सकती है।

Read more...

रविवार, 24 जनवरी 2010

ब्लागर्स मीटिंग

आज सुबह लगभग ११ बजे जब संजीव तिवारी जी का फ़ोन आया कि आज प्रेस क्लब में ३ बजे ब्लागर्स की प्रेस वार्ता है और मुझे भी आना है तो मै सोच रही थी की ब्लागर्स वार्ता में क्या होगा . क्योंकि अभी तक मेने सिर्फ लोंगो का ब्लॉग पढ़ा था लेकिन न ही मै उनसे मिली थी और न ही उन्हें जानती थी . सिवाय संजीव जी के, जिनकी प्रेरणा से मेने ब्लॉग जगत में कदम रखा । वैसे भी पिछले कुछ दिनों से हम लोग कुछ तथाकथित पत्रकारों से व्यथित होकर ब्लॉग से कुछ दुरी बना लिए थे मेने सोचा कि वंहा चलते है,शायद कोई हल निकल आये । संजीव जी ने पहले ही अपने कुछ ब्लोगर्स मित्रो से हमारी परेशानी कि चर्चा कि थी। प्रेस क्लब पहुच कर मेने पाया कि में अनजाने लोगो के बीच नहीं बल्कि अपने कुछ पुराने परिचितों के बीच आयी हू। अनिल पुसदकर जी , ललित शर्मा जी, राजकुमार ग्वालानी जी, अहफाज़ रशीद जी,पावला जी,सूर्यकांत गुप्ता जी, अवधिया जी,संजीत त्रिपाठी जी का जो आश्वासन मुझे प्राप्त हुआ उससे लग रहा हे कि हमारी परेशानी ज्यादा दिनों तक हमें परेशान नहीं करेगी। और इन सभी से मिलकर मुझे ये लगा कि हमें ब्लाग जगत से दुरी नहीं बनानी चाहिए थी और अभिव्यक्ति कि जो स्वतंत्रता हमारे सविधान ने हमें दी है उसका उपयोग करने से हमें कोई नहीं रोक सकता । क्योंकि सच हमेशा सच ही रहता है,और सच का समर्थन करना गलत नहीं है। मुझे ख़ुशी है कि मै वापस ब्लॉग जगत में आई ,और अब मेरी लेखनी किसी के डर से नहीं रुकेगी । मै आभारी हू आप सभी कि जिन्होंने मेरा हौसला बढाया और मुझे ब्लाग जगत में वापस लाया.....

Read more...

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

भक्ति का एक रूप यह भी.................


गणेशोत्सव से शुरू हुआ सार्वजनिक उत्सव दुर्गोत्सव आते तक आने चरमोत्कर्ष पर पंहुच जाता है। हर तरफ़ खुशी और जशन का माहौल । लेकिन क्या आपको कभी ऐसा नही लगता की इस खुशी और जशन के माहौल में लोग अपनी सीमा , अपनी मर्यादा भूल जाते है। पूजनीय देवी देवताओ क पवित्र रूप का मखौल लोग इस तरह उड़ते है जैसे अपनी फिक्र धुएं में उड़ा रहे हो। कभी गणेश जी को पेप्सी की बोत्तल पकड़ा दिए तो कभी उनके हाथ में एक डंडा पकड़ा क उन्हें पोलिस बना दिए. कभी क्रिकेट का बैट थमा के सचिन तेंदुलकर बना दिया तो कभी उनके हाथ में ऐ के ४७ पकड़ा कर उन्हें संजय दत्त बना दिया । जो लोग गणेश जी के इन प्रतिरूपो का निर्माण करते है उनकी हिम्मत देवी माँ के किसी प्रतिरूप के निर्माण के समय कहा चली जाती है । वही गणेश जी के इन प्रतिरूपो को आम जनता के समक्ष परोसने वाले लोग क्या कभी देवी माँ के किसी रूप का मखौल उड़ने की हिम्मत कभी कर पाएंगे। शायद नही...........

अब हम थोडी बाते करते है देवी देवताओ के विसर्जन के बारे में। गणेश ए़वं दुर्गा विसर्जन के समय लोंगो का उत्साह देखते ही बनता है लेकिन.........इस जबरदस्त उत्साह का स्वरुप क्या होता है..................बड़े बड़े डी.जे. सेट के पीछे एक दुसरे के ऊपर गिरते पड़ते ( जिसे वे अपनी भाषा में डांस करना कहते है ) बेसुधे (?)लोग (क्योकि डी.जे. में डांस का मज़ा होश में रहकर तो नही ले सकते ) । रात भर जिस डी.जे.की धुन पर वो लोग थिरकते है वो निश्चित ही भजन तो नही होते होंगे । एक तरफ एक ग्रुप जो बड़ी ही भक्ति भावः से भगवन का भजन करते हुए नज़र आते है, वही दूसरी तरफ ये दूसरा ग्रुप जो की अपनी सारी हदों को पार करते हुए , सारी मर्यादाए तोड़ते हुए उस रूप में नज़र आता है जिस रूप में वो अपने परिवार वालो के सामने कभी नज़र नही आना चाहता । और समाज के तथाकथित बुध्हिजिवी वर्ग उस समय अपनी आँखों में काली पट्टी बाँध अपनी नीद पुरी कर रहे होते है । या यु कहे की वो तथाकथित वर्ग भी अपने कानो में रुई भर कर भीड़ में कही शामिल हो.............. ।

Read more...

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

ब्लॉग में डालना जरुरी hai

Read more...

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

कथकली का मजाक कंहा तक उचित है...............


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



जी
टीवी में प्रसारित "Dance India Dance" जिसमे सुपर स्टार मिथुन चक्रवर्ती शो के ग्रैंड मास्टर हैं उनकी उपस्थिति में 04th april रात 10 बजे प्राचीन भारतीय नृत्य "कथकली" का प्रदर्शन एक हिन्दी फिल्मी गाने पर किया गया था ।भारतीय शास्त्रीय नृत्य के लिए यह बहुत ही गौरव की बात है की अब शास्त्रीय नृत्य हर ज़गह लोकप्रिय हो रहे है लेकिन "डांस इंडिया डांस" के इस शो को देखने के बाद शास्त्रीय नृत्य प्रेमियों के लिए यह एक बहुत ही शर्मनाक और दुःख का विषय है की उपरोक्त प्रोग्राम में कथकली नृत्य की किस तरह धज्जियाँ उडाई गई है ।बहुत ही फूहड़ गाने "चुम्मा -चुम्मा दे दे " जैसे फिल्मी गाने पर कथकली जैसे प्राचीन नृत्य शैली पर नृत्य का भौंडा प्रदर्शन आख़िर कंहा तक उचित है ? शायद इस डांस की choreographer "मास्टर गीता" को भी यह अहसास नही की उन्होंने कुछ नया प्रयोग करने के चक्कर में सिर्फ़ कथकली ही नही पूरे भारतीय शास्त्रीय नृत्य का किस तरह मजाक उड़ाया है? शायद वो ये भूल गई थी की शास्त्रीय नृत्यों की जीवन्तता आज भी बरक़रार है उनका अपना एक महत्व है ,उनकी अपनी अलग एक पहचान है.प्रयोग तो शास्त्रीय नृत्यों में भी किए जाते है लेकिन झूठी और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का इससे आसन रास्ता शायद उन्हें नही मिला होगा जो मास्टर गीता ने कथकली नृत्य में "चुम्मा-चुम्मा दे दे" गीत का प्रयोग किया.यदि वो इस नृत्य शैली में किसी और गीत का प्रयोग करती तो शायद शास्त्रीय नृत्य प्रेमियों को इतना दुःख नही होता.

Read more...

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

collection - 1

अंधेरा चाहे जितना घना हो
पहाड़ चाहे जितना तना हो
एक लौ यदि लग जाए
एक कदम यदि उठ जाए
कम हो जाता है अंधेरे का असर
झुक जाती है पहाड़ की भी नज़र
अंधेरा तो रौशनी की रहनुमायी है
पहाड़ तो प्रेम की परछाईं है
सच तो यह है -
धाराओं के विपरीत
जो जितनी भाक्ति से
खड़ा होता है
उस आदमी का व्यक्तित्व
एक दिन उतना ही बड़ा होता है !

Read more...

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

toshi

"toshi'..........toshi means
1.........happiness giver................(in my knowledge)
2......... "A M R I T" in hindi (holy water in english)!!!
3......... means mirror image in urdu it means a person who is loved by every one
4..........means profit in hindi its munafa
5.......... meaning as "A feeling of self sufficiency" In other words Content.
6..........means "Treasure".....
7..........means : "S A T I S F A C T I O N".
8.......... TOSHI comes from the Sanskrit word "Tusht" which means Satisfaction...so Toshi would be a person who is satisfied with what he/she has...

dont know what is the actual meaning but sure abt ....toshi.......

i want 2 do something very special and unique in my life coz i think i am very special and unique so i must do very special and unique.......................................

sometimes situations may be very opposite but i never fell down,and i know very well that i will achieve my goal...........................................

yes........i can do what i want to do..................................................

hey,one more thing which is more important abt me that is......................
I Am What i AM......and.....................I don care what peaple think abt me..............................

Read more...

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP