toshi

apne vajood ki talash me.........
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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

बेकाबू होती भीड़ पर किसका काबू...

घटना १ - २ जनवरी रायगढ़ जिले के दानसरा नामक  गाव में सड़क हादसे में ट्रक से एक व्यक्ति की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ द्वारा ४ अन्य ट्रक आग के हवाले कर दिया गया.साथ ही २ प्राइवेट कारो को भी नुकसान पहुचाने की कोशिश की गई....


घटना -२-  ३१ जनवरी को जांजगीर- चांपा जिले के चंद्रपुर में सड़क हादसे में एक व्यक्ति की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने १० वाहन  फूंक दिए साथ ही मौके का फायदा उठाते हुए देशी विदेशी शराब की दुकानों में लूट पाट कर करीब ३ लाख रूपये उड़ा लिए...

घटना-३- ३१ जनवरी दुर्ग जिले के धमधा में एक ट्रक की चपेट में आने से ५ साल की बच्ची की मौत के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने ट्रक चालक की जमकर पिटाई कर ट्रक में आग लगा दी...


घटना-४- २ फरवरी राउरकेला में एक स्कूल बस से एक छात्र की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने बस में आग लगा दी...

                                          उपरोक्त सभी घटनाये दुखद ज़रूर है पर  कंही न कंही सभी घटनाओं में लापरवाही पूर्वक वाहन चलाने की धृष्टता  भी नज़र  आ रही है . लेकिन ये सभी घटनाये उस  बेकाबू होती भीड़ की ओर इशारा कर रही है जिस पर उस अप्रिय घटना के बाद काबू नहीं पाया जा सका और एक अप्रिय घटना के घटित होने के फलस्वरूप कई अप्रिय घटनाओ का जन्म हुआ . ऐसी घटनाये आये दिन आपको न्यूज़ पेपर में पढने को मिल जायेंगे जिसमे किसी घटनाक्रम से गुस्साए लोंगो द्वारा क़ानून तोडा गया हो . पर इस बेकाबू होती भीड़ पर बिना किसी अप्रिय घटना को अंजाम दिए काबू  पाने की न्यूज़ आपको किसी न्यूज़ पेपर में नहीं मिलेगी कारन उस बेकाबू होती भीड़ पर किसी का काबू नहीं होता ......

                      अब सवाल यह उठता है कि इस भीड़ में इतना आक्रोश ,इतनी नफरत , इतनी हिंसा आखिर आई कहा से....

                                                 जब हम कोई अखबार पढ़ रहे होते है तो देश कि गौरव गाथा कहने वाले, जनरल नालेज  वाले,वैजानिक तर्कों आदि की  खबरे  कम और नकारात्मक सोच देने वाली खबरे ज्यादा होंगी. इसी तरह इलेक्ट्रानिक मीडिया, जो नकारात्मक, हिंसक और घटिया बातो को लगातार रात- दिन अपने चैनल पर दर्शको को ऐसा मसालेदार तड़का लगाकर परोसता है जिसमे आम  दर्शक सिर्फ ये आस लेकर बैठा रहता है कि अब आगे क्या होगा..लेकिन समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जो इन समाचार चैनलों को जानकारी का सबसे सही जरिया मानकर अपना अधिकांश वक्त लगाते है  उस वर्ग पर ऐसे घातक न्यूज़ का क्या असर पड़ता होगा वो इस बात से अनजान रहते है या अनजान बने रहने का झूठा दिखावा करते है. टी.आर.पी. की अंधी दौड़ में शामिल और गलाकाट आपसी मुकाबले में  लगे इन न्यूज़ चैनलों का नैतिक मूल्यों से आखिर क्या सरोकार...? और ऐसे माहौल में दर्शको या पाठको की सोच को सरोकारविहीन , गैर जिम्मेदार और लापरवाह होने से कैसे बचाया जा सकता है...?

          हालाँकि इस बेकाबू होती भीड़ का पूरा जिम्मेदार  सिर्फ मीडिया को ठहराना गलत होगा लेकिन फिर भी मेरा मानना यही है कि जब रात-दिन मीडिया दुनिया भर कि नफरत और हिंसा दिखने पर आमादा हो तो इंसानी सोच पर उसका असर पड़ना तो तय है...


          

11 टिप्पणियाँ:

Sanjeet Tripathi 3 फ़रवरी 2010 को 1:10 am  

kuchhek had tak aapki baat se sehmat hu bavjud iske k mai khud media se hu

अभिषेक प्रसाद 'अवि' 3 फ़रवरी 2010 को 7:47 am  

aapki baaton se purntah sahmat hun... aise ghatna kram ke pichhe aam vyakti ka haath nahi hota hai... aam vyaktiyon kee bhavnaon ko uksa kar koi ek rajnitik ya paisachik vyakti parde ke pichhe rah kar ye sab kaam karta hai...

श्याम कोरी 'उदय' 3 फ़रवरी 2010 को 8:42 am  

.... भीड, चक्काजाम, तोडफ़ोड, लूटपाट ...... ये घटनाएं आम हो गई हैं, ये सिर्फ़ छत्तीसगढ मे ही नही हो रहीं वरन पूरे देश का यही हाल है... दरअसल एक घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप यह भीड एकत्रित होती है और आक्रोसित होकर अनेकों घटनाओं को अंजाम दे देते हैं .... सही मायने मे देखा जाये तो ये हमारे देश के लचर सिस्टम के कारण हो रहा है !!!!

ललित शर्मा 3 फ़रवरी 2010 को 9:01 am  

अनियंत्रित समुह ही भीड़ कहलाता है।
इसलिए इसपर किसी का काबु नही होता।
मानव वृति से पशु वृति मे बदलने मे
सिर्फ़ एक मात्रा का ही अंतर होता है।

समाज=मानवों का समुह
समज=पशुओं का समुह

सूर्यकान्त गुप्ता 3 फ़रवरी 2010 को 9:55 am  

बहुत ही अच्छे विचार
दुनिया में लोग परम सत्ता को तो डरते हैं
किन्तु इस जगत मे जैसे किसी मुखिया
क संरक्षण आवश्यक होता है केवल हमारे
अनैतिक कार्यों में अंकुश लगाने के लिए
उसी प्रकार यदि स्वायत्ता पर थोडा अंकुश
लग जाए तो मीडिया भी सोच समझ के
काम करेगी.

PrakashYadav 3 फ़रवरी 2010 को 5:12 pm  

toshi ji,
badhai ek aur abhivayakti ke liye...

lalit sharma ji aur suryakant gupta ji ki baaton se main bhi sahmat hoon, pe in sabme media ka bhi bad ahaath hai aur khaas kar electroni media ka jo is tarh ki news ko aur bhi ghatak tarah se parosta hai... manav man hai hi aisa ki apne aakrosh ya yon kahen ki antarman ki kamjri ko is tarah se abhivayakt karta hai...
aapko yaad hoga US ki 9/11 ki ghatna....
kya aapne wahaan ke media ko kabhi dekha kisi chitkaar karte hue ya kisi dead body ko cover karte.... shayad nahin, agar aapne dekha hoga to sirf wahaan ke logon ko shradhanjali arpit karte hue 9/11 mein maare hue logon ko....
US media ki yeh coverage shayad ek misaal ho auron ke liye...

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 5 फ़रवरी 2010 को 5:34 pm  

सुन्दर लिखा आपने. धन्यवाद.

arvind 5 फ़रवरी 2010 को 5:45 pm  

बहुत ही अच्छे विचार,सुन्दर

krantidut.bligspot.com

Dr.amit 7 फ़रवरी 2010 को 8:17 pm  

"अब सवाल यह उठता है कि इस भीड़ में इतना आक्रोश ,इतनी नफरत , इतनी हिंसा आखिर आई कहा से...."


bada he gehan sawal utha dala aapne to, or bakhubi iska jawab bhi diya hai, bahut achcha laga paddh kar, roj-marra ki is sachchaai ko badi he kusalta se darshaya gaya hai. bahut he khubsurti ke saath likha hai aapne.

ravi k.gurbaxani 11 फ़रवरी 2010 को 9:19 pm  

bahut achcha r sargarbhit vichar hai aapke toshiji....ak r jwalant shuruaat...achcha hai...great...

M VERMA 12 फ़रवरी 2010 को 6:47 am  

भीड़ की मानसिकता को आँक पाना मुश्किल होता है
और फिर मीडिया की नकारात्मक भूमिका भी तो दिखती ही है

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