toshi

apne vajood ki talash me.........
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सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

"मजबूरी"

"मजबूरी"

ये कमाने की मजबूरी भी बड़ी निर्दयी होती है साहेब,
ना स्त्री देखती है, ना पुरुष,
कमाई तो सिर्फ एक बहाना है,असल मुद्दा तो घर चलाना है, 

बेटे को उनके दोस्तों जैसी सायकल और,
बेटी को, उसके मनचाहे गुड़ियों से बहलाना है,

पुरुष बन आजीविका के साधनों को जुटाना और,
स्त्री बन उन साधनों से सबको संतुष्ट करना है,

स्त्री हो अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए चंद पैसे जुटाने दहलीज़ के बाहर कदम बढ़ाना है और,
अपने आत्मसम्मान की रक्षा और अपने वजूद को बचाना है,,,,,

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सोमवार, 29 जनवरी 2018

Mona Modern School Sarangarh, ALBELA SAJAN AAYO RE, malhar 2017-18,2

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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

ऊंची होती उड़ान.....

ऊँची होती उड़ान ........


एक चिड़िया,
खुले आसमान में , 
स्वतन्त्र , स्वच्छंद,
दूर दूर तक अपने  पर फैलाती, 
तरह तरह की कलाबाजियां दिखाती, 
निरंतर और ऊपर और ऊपर उड़न भरती ,  
अपने में मस्त ........ अपने में मगन, 
अपने परों को साफ करती, सजाती, संवारती, 
अपने परों का खास ख्याल  रखती, 
उसकी यही खूबी , उसकी यही प्रतिभा, 
उसके साथी परिंदों को तीर सा चुभती, 
वो उसकी उड़न को रोक तो नहीं सके ,
पर धीरे धीरे उसके परों को नोचना शुरू किया , 
हर एक पर के नोचे जाने पर वह दर्द से तड़प उठती ,
चीखती, और उसके तथाकथित हमदर्द, हमसाथी, सफेदपोश, 
नकाब के  पीछे खुशियां मनाते और ताली बजाते , 
इधर हर एक पर नोचे जाने के बाद, 
वो चिड़िया अपना दर्द भूलकर, 
नए उत्साह, नए हौसले से और ऊँची उड़ान भरने की कोशिश करती , 
ये सिलसिला बढ़ता जा रहा था , 
उसके पर लगातार नोचे जाते 
और दर्द के बाद उसकी उड़ान , 
और ऊँची ...... और ऊँची....... और ऊँची.... होती जाती, 
हर दर्द के साथ वो यही सोचती , 
आखिर कब तक उसके साथी परिंदे , 
इसी तरह उसके पर नोचकर , 
उसकी उड़न पर मुश्किलें डालकर , 
अपनी उड़ान ऊँची दिखा पाएंगे .......? 
और क्यों उसके साथी परिंदे ईमानदारी और मेहनत से 
अपनी उड़ान ऊँची नहीं करना चाहते.....? 
क्या दूसरों के पर काटकर ही ऊँची उड़ान भरी जा सकती है.....? 

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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

चिंता  

सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर्स के प्राइवेट क्लिनिक में आज हलचल कुछ कम थी।  मरीजों की संख्या भी कम थी।  आवक कम की वजह में पता चला कि कसबे के एक समाजसेवी संस्था ने आज निःशुल्क मेडिकल कैम्प लगा रखा है जहाँ पास के शहर के नामी गिरामी स्किल्ड डॉक्टर्स अपनी निःशुल्क सेवाओं के साथ निःशुल्क दवाओं का वितरण भी कर रहे हैं। दूर दराज के गांवों के भी बीमार ज़रूरतमंद आज इस कैम्प में एक आशा के साथ आ रहे थे और मुकुराहट लिए ढेरों दुवाएं देते चले जा रहे थे।  अचानक कैम्प में खलबली मच गई।  पता चला कि अवैध रूप से बिना सरकारी अस्पताल के परमिशन के मेडिकल कैंप लगाने पर उस समाजसेवी संस्था पर कार्यवाही का नोटिस मिला है। नोटिस मिलते ही संस्था के प्रतिष्ठित लोग कैंप से नदारत हो गए , आखिर एन मौके पर उन्हें कसबे के डॉक्टर्स से ही इलाज मिल सकता था।  कुछ समय बाद कसबे के डॉक्टर्स के शिकन भरे चेहरों पर असीम शांति का भाव था और इधर मरीजों के चेहरों पर पुनः चिंता के भाव उभर आये थे। 

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रविवार, 14 नवंबर 2010

" मोना स्कूल की राज्य स्तरीय उपलब्धि "

नेशनल साइंस ड्रामा फेस्टिवल के लिए एक बार फिर छ.ग. से मोना माडर्न स्कूल,सारंगढ़ का चयन.नेहरु साइंस सेंटर, मुबई में आयोजित इस कॉम्पिटिशन में पहले भी मोना स्कूल का चयन २००८-२००९ में हो चूका हे जिसमे राष्ट्रिय स्तर पर स्कूल को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था.इस बार भी नेशनल साइंस ड्रामा फेस्टिवल , नेहरू साइंसे सेंटर ,मुंबई में आयिजित है.जिसमे पश्चिम भारत के अन्य राज्यों के साथ छ. ग. का प्रतिनिधित्व करते हुए मोना माडर्न हा. से. स्कूल सारंगढ़ , इस प्रतियोगिता में अपनी मजबूत दावेदारी पेश करेगी 

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गुरुवार, 6 मई 2010

" ये सब सिर्फ वीरान है "


आप में ही कलाकार,
मै एक फनकार,
पर दिल है उदास,
देखकर ये झगडे, दंगे और फसाद,
कोई किसी का अपना कंहा,
तुम अपने में, मैं  अपने में जंहा,
मांगने से कुछ मिलता कंहा,
कुछ मिलता तो कुछ खोता जंहा,
देखो दुनिया की कैसी ये रीत हैं,
हर आदमी को किसी न किसी तरह,हर चीज़ से प्रीत है,
प्रकृति की सुन्दर वादियों से,
कवि की सुन्दर कल्पनाओं से,
हम सब जुड़े हैं एक रिश्तों से,
पर इनमें हैं कितनी दूरियां ,
कुछ मनचली , कुछ चंचली, कुछ खामोशियाँ,
इन नाजुक रिश्तों को प्यार की तलाश हैं,
कुछ मेरी , कुछ आपकी लम्बी दास्ताँ है,
इनमें अपनों को ढूंढा तो पाया,
" ये सब सिर्फ वीरान है "

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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

इरादे आजमाती मुश्किलें




"मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं ,
स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,
हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर,
ठोकरें इंसान को जीना सिखाती हैं" 


                                     आज बारहवी का रिजल्ट निकलने वाला है..........मन के किसी कोने में एक डर समाया हुआ है कि कल के पेपर में ना जाने क्या पढने को मिले, कारण............ परीक्षाफल निकलने के साथ ही अख़बारों में हर साल कुछ केस पढने को मिल ही जाते हैं कि फलां ने फेल होने पर फंसी लगा ली या फिर फेल होने के डर से किसी ने आत्महत्या कर ली या आत्महत्या का प्रयास किया या घर से भाग गया. एक बात मेरी समझ से परे है कि न्यू  जेनरेशन के ये बच्चे इतने प्रतिभावान और समझदार होते हुए भी इतनी नासमझी की हरकत क्यों और कैसे कर बैठते हैं? और ये भी कि ये ऊर्जावान पीढ़ी इतनी निराशाजनक कब से हो गई?

                                      विद्यार्थियों की इस प्रवृत्ति के पीछे जितना जिम्मेदार वह स्वयं है, उतने उसके माता-पिता या शिक्षक भी हैं. आजकल पेरेंट्स अपने बच्चो से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखते हैं कि किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को वे अपने परिचितों के बच्चो से किसी भी मायने में कमतर नहीं देख सकते उसी तह शिक्षकों का दोहरा दबाव इस कॉम्पिटिशन के युग में एक विद्यार्थी की मनः स्थिति में क्या प्रभाव डालता होगा इसका आंकलन आप स्वयं कर सकते हैं.
                                       
                                        सभी अपना एक लक्ष्य निर्धारित करके रखते हैं. माना कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो गया तो ऐसा भी तो नहीं कि वह और किसी लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकता. यदि एक छात्र इंजीनियरिंग की परीक्षा में असफल होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो यह उसकी बेवकूफी होगी कारण कि वह अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिये अपना भविष्य बना सकता है 

                                         असफलता का समाधान स्वयं को नुकसान पहुचाना तो नहीं होता और ये भी ज़रूरी नहीं कि एक बार की असफलता हमेशा की असफलता हो.कोशिश करने से तो ज़टिल से ज़टिल कार्य भी पूरा हो जाता है, फिर निर्धारित लक्ष्य क्यों प्राप्त नहीं किया जा सकता..................
  
"कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों..................."

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