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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

भूखा गिद्ध

 भूखा गिद्ध 


कोरोना की भयावह स्थिति की रिपोर्टिंग करनी थी। जिसके लिए मैं एक अस्पताल जा पहुंचा। अस्पताल में जगह नहीं थी, लोगों को बेड नहीं मिल रहे थे, ऑक्सीज़न नहीं मिल रहा था, दवाइयाँ और इंजेक्शन नहीं मिल रहे थे। लोग अस्पताल के बाहर ही बरामदों में , कारों, ऑटो और रिक्शे में अपने रिश्तेदारों के एक- एक सांस के लिए जद्दोजहद करते दिख रहे थे। पास ही एक रिक्शेवाला खड़ा था जिसने अपने रिक्शे में एक तख़्ती लगा रखी थी, "कम कीमत पर मुक्तिधाम ले जाने की व्यवस्था" । साथ में उसकी बीवी जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा भूख से बिलखते हुए अपने हाथ के अंगूठे को चूस रहा था, और एक छोटी बच्ची जिसकी आंखों के आँसू अब सूख चुके थे जो कातर नज़रों से अपनी माँ को निहार रही थी। बरामदे में एक -एक सांस के लिए लड़ते एक व्यक्ति के पास ही खड़े थे तीनों। अभी-अभी डॉक्टर ने उसकी नहीं बचने की संभावना व्यक्त की थी। अचानक ही मुझे एक फोटोग्राफर की चर्चित फोटो की याद या गई जिसमें एक भूखा गिद्ध , भूख से बदहाल एक छोटे से बच्चे की मौत का इन्तज़ार कर रहा था, ताकि उस बच्चे की मौत के बाद उसका भक्षण कर अपनी भूख शांत कर सके। उस फोटो की जीवंतता आज मुझे उस अस्पताल के बरामदे में नज़र आ रही थी।


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