अनन्त यात्रा
अनन्त यात्रा
क ख ग से शुरू करके ,
चल पड़ी एक अनंत यात्रा,
बढ़ते - बढ़ते जाना,
ये तो है बस अथाह यात्रा,
नित नयी सीख लेकर,
जब पहुँची किसी मंज़िल पर,
लगा कि यही तो वो मज़िल है,
जहाँ पहुँचना चाहा था कभी,
लेकिन ये क्या,
ऊपर देखा तो जाना,
ये तो अगली मंज़िल की,
पहली पायदान ही है,
आगे लंबा सफ़र अभी बाक़ी है,
फिर चल पड़ती,
उस नयी मंज़िल की,
राह पर,
नयी सीख लेकर,
नित नये ज्ञान लेकर,
ख़ुद का कद बढ़ाती,
नित नये ज्ञान के आभूषण से,
ख़ुद को सँवारती,
अब किसी मंज़िल पर पहुँच,
देख लेती हूँ ऊपर की ओर,
और समझ जाती हूँ,
कि मंज़िल ये नहीं,
ये तो सिर्फ राह में आया पड़ाव है,
मंज़िल तो अभी दूर है,
और इस राह पर अभी,
आगे बढ़ते जाना है,
अपने ज्ञान का भंडार बढ़ा,
अभी उसे औरों तक,
पहुँचाना है,
अपने अनुभव से लोगों में,
ज्ञान भी बाँटते जाना है,
साथ ही निरंतर,
इस अनन्त अथाह यात्रा पर,
आगे बढ़ते जाना है,
✍️तोषी गुप्ता✍️
25-03-2022