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शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

मासूम बचपन

 



*मासूम बचपन*




घर की चारदीवारी में कैद ये बचपन,


पुस्तकों के ढेर के बीच बीतता ये बचपन,




होकर मोबाइल पटल पर अब कैद ये बचपन,


लैपटॉप, वीडियोगेम से मनोरंजन करता ये बचपन, 




खुली हवा में साँस लेना चाहता ये बचपन,


रात में चांदनी रातों में सितारों की चाल देखना चाहता ये बचपन,




 दादा नाना ,चाचा, ताया, मामा संग खेतों की ख़ुशबू लेना चाहता ये बचपन,


दादी, नानी,मौसी, बुआ, चाची संग ठिठोली करना चाहता ये बचपन,




छत पर जाकर पतंग उड़ाना चाहता ये बचपन,


खुले मैदान में भँवरों के पीछे दौड़ लगाना चाहता ये बचपन, 





बागों में फूलों की ख़ुशबू लेना चाहता ये बचपन,


कल कल करती नदियों की आवाज़ सुनना चाहता ये बचपन,





रेस टिप, नदी-पहाड़, छू छुवल की दौड़ लगाना चाहता ये बचपन,


पोशम पा, बिल्लस, भी खेलना चाहता ये बचपन,




दोस्तों संग हँसना खिलखिलाना चाहता ये बचपन,


उन संग रूठना मनाना चाहता ये बचपन,





समय के साथ बदल गया ये बचपन,


घर की चारदीवारी में कैद ये बचपन,




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

27/03/2021

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

ज़रा संभल कर

 


ज़रा संभल कर




मतलबी इस दुनिया में 


कदम बढ़ाना मग़र


ज़रा संभल कर,


लोगों पर विश्वास कर


साथ चलना मग़र


ज़रा संभल कर,





दिल देकर


दिल लगाना मग़र


ज़रा संभल कर,


प्यार की डगर पर


कदम बढ़ाना मग़र


ज़रा संभाल कर,

 



धोखेबाजों की इस भीड़ में


रहना तुम्हें है, मग़र


ज़रा संभल कर,


झूठ और सच की भीड़ में,


सच को पहचानना है, मग़र


ज़रा संभल कर, 





रिश्तों की अनसुलझी डोर में


रिश्ते निभाना मग़र


ज़रा संभल कर,


झुक कर निभाना


मान करना रिश्तों की मग़र


ज़रा संभल कर,





साध कर लक्ष्य अपना


मंज़िल की तरफ़ कदम बढ़ाना मग़र


ज़रा संभल कर,


ख़ुद को है संभालना और


ध्यान रखना भी दूसरों का मग़र


ज़रा संभल कर,





पाकर अपने अधिकारों को 


अपना कर्तव्य निभाना मग़र


ज़रा संभल कर,


जीवन डगर पर बढ़ना


कांटों में फूल खिलाना मग़र


ज़रा संभल कर,




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

24 फ़रवरी 2021 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

दरियादिल "फर्ज़"


 *दरियादिल*


*फर्ज़*


गीता आज बहुत खुश थी। आते ही उसने माँ के पैर छुए और आशीर्वाद लिया। आज वो कॉलेज में व्याख्याता से प्रिंसिपल हो गई थी।और साथ ही अपने सहकर्मी  व्याख्याता अजय से विवाह करने जा रही थी।पिता के जाने के बाद से ही घर की सारी जिम्मेदारी गीता के ऊपर ही आ गई थी। घर की जिम्मेदारियों और छोटे भाई बहनों की परवरिश के लिये उसने खुद शादी भी नहीं की। छोटी बहन अब अपने ससुराल में सुखी थी और छोटा भाई भी अब बैंक में अच्छी पोस्ट पर था जिसकी भी शादी और बच्चे हो चुके थे।सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद ही अब उसने अजय से शादी का फैसला लिया था।शादी को एक ही हफ्ता बचा था। लेकिन वक़्त को कुछ और ही मंज़ूर था। पता चला कि उसके छोटे भाई की दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं, और उसे किडनी की ज़रूरत है। गीता ने अपना टेस्ट कराया और गीता की किडनी उसके छोटे भाई से मैच हो गई।एक बार फिर अपने जिम्मेदारियों के चलते गीता ने अजय से अपनी किडनी छोटे भाई को दान करने की मंशा ज़ाहिर की। अजय अपनी भावी पत्नी की दरियादिली से वाक़िफ़ था। और हर बार की तरह इस बार भी उसने गीता का पूरा साथ दिया। गीता ने एक बार फिर अपने निजी सुखों का त्याग कर दरियादिली दिखा अपना फर्ज़ पूरा किया, लेकिन इस बार उसे खुशी थी कि उसका भावी पति भी उसकी इस दरियादिली में उसके साथ था।


✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

23 / 02/ 2021 

आत्मसम्मान

 



*प्रतिज्ञा*


*आत्मसम्मान*


आज सुबह शालू थोड़ा जल्दी उठ गई। गैस पर चाय  चढ़ा बिस्तर तह करके करीने से रखने लगी, इधर चाय बन गई । शालू चाय की प्याली लेकर खिड़की के पास आ गई, आज उसका मन थोड़ा बेचैन था,क्योंकि आज उसकी बेटी सुमन का मेडिकल प्रवेश परीक्षा का परिणाम आने वाला था। ऐसे में खिड़की से आती हल्की बारिश और मंद हवा तन मन प्रफुल्लित कर रही थी। 


चाय की चुस्कियों और सुहाने का मौसम का मज़ा लेते शालू अपनी यादों में बीस वर्ष पूर्व चली गई। वैसे तो सुहास शालू के प्रति अपना हर फ़र्ज़ निभाता लेकिन कही न कहीं उसे लगता कि सुहास उससे प्यार नहीं करता।तीन वर्ष की बेटी सुमन भी अपने पापा के प्यार को, उनके साथ को तरस जाती। शालू से कम से कम बातें करना, सुबह जल्दी ऑफिस चले जाना और रात को घर देर आना सुहास की आदत बनती जा रही थी। शालू ने बहुत कोशिश की कि सुहास का प्यार पा सके,उसके मन में अपने और सुमन के लिए जगह बना सके लेकिन सुहास अब और भी उखड़ा उखड़ा रहता।


उस दिन सुहास सुबह जल्दी ऑफ़िस चला गया सुमन को तेज बुख़ार था शालू ने सुहास को फ़ोन लगाया लेकिन उसने कहा वो खुद ही सुमन को डॉक्टर के पास लेकर चली जाए। शालू अकेले ही सुमन को डॉक्टर के पास लेकर गई। डॉक्टर ने दवाइयां लिख दी। पैसे देने के लिए पर्स खोला तो देखा जल्दी जल्दी में वो तो पैसे और मोबाइल रखना ही भूल गई, परिचित डॉक्टर ने अपनी फीस बाद में देने बोल दिया। लेकिन दवाइयों के लिए तो पैसे चाहिए थे। 


पास ही सुहास का ऑफिस था, शालू सुहास के ऑफिस चली गई , और जैसे ही शालू ने सुहास के केबिन में प्रवेश किया तो देखा सुहास और सुहास की कलीग प्रिया एक दूसरे की बाहों में हैं। शालु को इस तरह सामने देख सुहास बुरी तरह सकपका गया और शालू बिना एक पल भी देर किए सुमन को लेकर तेज़ कदमों से बाहर चली गई, उसकी आँखों से अनवरत आँसू बह रहे थे, उसे सुहास की बेरुखी का कारण साफ नज़र आ रहा था। शालू ने अपने कदम और भी तेज कर दिए, इस *प्रतिज्ञा* के साथ कि अब वो सुहास के पास कभी नहीं लौटेगी , अपने आत्मसम्मान की रक्षा उसे खुद ही करनी होगी और अब उसने स्वयं ही सुमन को उसकी जिंदगी में सफल बनाने का *प्रण* लिया और अनजानी राहों में अपनी बेटी का हाथ थामे चल पड़ी । 


माँ .... माँ .... सुमन की आवाज़ सुन सहसा शालू वर्तमान में लौट आई, सुमन  माँ के गले में बाहें डाल खुशी से बोली, माँ मेरा मेडिकल में सलेक्शन हो गया। शालू की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उसने बेटी की नज़र उतारी उसे मीठा खिला ही रही थी कि सुमन ने उसके हाथों से मीठा लेकर उसे खिला दिया और बोली माँ आपकी तपस्या सफल हुई। और दोनों एक दूसरे के गले लग गए। दोनों की आंखों से खुशी के आँसू बह रहे थे।


✍️तोषी गुप्ता✍️

02 फ़रवरी 2021


बंधन


 *बंधन*




बंधे परों से उड़ने की चाह , 


और, 


मौन में बन्द उसकी अंतरात्मा की आवाज़,





वो उड़ना तो चाह रही है, 


लेकिन, बचपन में बांध दी गई है,


लड़की होने की दहलीज़ में,




यौवन में उड़ना चाही, तो,


लोक, लाज, ने जकड़ लिया 

उसके परों को और मज़बूती से,



फिर लांघ कर बाबुल की दहलीज़, 

पहुँची पिया के घर,



जकड़ लिया बहु होने के संस्कारों ने,


फिर माँ बन ममता ने,


और फिर बीतते समय के साथ फ़र्ज़ ने,




उड़ने की चाह में, ज़िन्दगी के 

अब उस मोड़ पर खड़ी थी, 


जहाँ, लग रहा था उसे ,

जैसे उड़ना भूल ही गई हो वो,

ऊँचे आसमान को निहारते,



झूठी आस में बंधी नन्ही चिड़िया,


अब भी इसी आस में 

अपनी सारी ज़िन्दगी बीता देना चाहती है कि,


कभी तो ये बंधन खुलेंगे,


और वो उड़ सकेगी,


अपनी ऊँची उड़ान,


और छू सकेगी आसमान!!




✍️तोषी गुप्ता✍️
05  फ़रवरी 2021

*कोख़ में अकेली,,,,, आख़िर गलती किसकी,,,,?*


 *कोख़ में अकेली,,,,, आख़िर गलती किसकी,,,,*



आज फिर खुशी की घड़ियाँ आई,


माँ बनने की ख़बर जो आई,


समय पंख लगा उड़ने लगा,


कुछ दिनों बाद खुशी दोहरी भी हो गई,


पता जब चला कोख में एक नहीं दो कलियाँ हैं जी रही,


खुशियाँ ही खुशियाँ थी दामन में भर रही,





पल भर में खुशियाँ मायूसी में बदल गई, 


जब कोख में जी रही साँसों की पहचान की गई,


एक कली लड़का और एक कली लड़की थी कोख़ में पल रही, 


एक ही कली को लाने बाहरी दुनिया में,


सब ने आपस में मिलकर हामी भरी,





कोख में कलियाँ तो दोनों थी मासूम, अधखिली,


थामे दोनों एक दूजे का साथ,


सपने संजोते बाहरी दुनिया के साथ-साथ,


बाहरी दुनिया की मायूसी से बेख़बर,


दोनों थे साथ- साथ, हर पल, हर क्षण,


साथ- साथ अठखेलियाँ करते,


एक दूजे को मनाते, रूठते,


एक दूजे संग खेलते और खिलाते,


हर पल एक दूजे की सांसों को महसूस करते,


एक दूजे की मुस्कुराहट और दर्द भी साथ महसूस करते,


दोनों एक दूजे का हाथ थामे खुशियों में मशगूल थे,





अचानक थोड़ी घुटन महसूस होने लगी,


आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा,


कोई धारदार हथियार उन्हें अपनी ओर आता नज़र आया,


लेकिन यह क्या, वो औज़ार तो केवल एक कली की तरफ बढ़ रहा है,


जहाँ वो कली भागती, वो औज़ार उसकी तरफ ही आता, 

 

घबराहट में साथी से अब हाथ छूट चुका था, 


वो धारदार हथियार अब उसे तकलीफ़ पहुंचा रहा था,


वो कली खूब चीखी चिल्लाई और अंत में मौन हो गई, 


अकेली रह गई दूसरी कली,


स्तब्ध,,,,,, निःशब्द,,,,, मौन,,,,





वो हथियार अब जा चुका था,


दूसरी कली अब अकेली और शांत थी,


पहचान दोबारा की गई, 


पर ये क्या,,,,,, मायूसी अब शोक में बदल गई,


धारदार हथियार ने एक कली ज़रूर कुचल दिया,


लेकिन वो कली लड़की नहीं लड़का थी,


नियति को कौन कब बदल सका है,


कोख़ में अब भी एक कली सुरक्षित सांसें ले रहा था,


वो कली लड़की थी, जो अब भी कोख़ में, स्तब्ध,,,, निःशब्द और मौन,,,,थी




सोच रही थी, आखिर क्यों उसका साथी उससे जुदा हो गया,


आख़िर गलती किसकी थी,


जो जुदा हो गया उसकी,


या फिर वो जो अब भी साँस ले रही है कोख़ में,,,,,,




✍️तोषी गुप्ता✍️

13 फ़रवरी 2021

पिता


 परिवार के आधार स्तंभ होते हैं पिता,

सर पर रख हाथ, आशीर्वाद बन जाते हैं पिता,



तप कर धूप की गर्मी में, 

परिवार के लिए निवाला लाते हैं पिता,

कठिन परिस्थितियों में भी, 

अपना फर्ज निभाते हैं पिता,



सही गलत की पहचान कराते,

 कभी डांटते हैं पिता,

बनते हैं फिर मार्गदर्शक ,

निःस्वार्थ प्रेम करते हैं पिता,



पथरीली पत्थरों पर चलकर, 

बच्चों के लिए राह बनाते हैं पिता,

नर्म हथेली की थपकी उन्हें देकर, 

उनके सपनों के लिए जागते हैं पिता,



 सख़्त हृदय का बनकर, 

पत्थर सा मजबूत बनते हैं पिता,

सच तो ये है परिवार की बागडोर होते हैं पिता,



परिवार के आधार स्तंभ होते हैं पिता,

सर पर रख हाथ, आशीर्वाद बन जाते हैं पिता,


✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

20 फ़रवरी 2021

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

वो पल बहुत याद आते हैं




वो पल बहुत याद आते हैं




थाम कर यूँ, वो हाथ तुम्हारा,


अनजाने रास्तों पर चलते जाना,


ठोकर लगी रास्ते पर जो,


तुम्हारा आगे बढ़ मुझे संभालना,


सच कहूं,,,,वो पल बहुत याद आते हैं,,,,





रूठकर तुमसे, यूँ ख़फ़ा बैठ जाना,


बोलते लबों का फिर चुप हो जाना,


तुम्हारा मुझे देखकर फिर मुस्कुराना,


हाथों में लेकर हाथ फिर मस्तक चूम लेना,


सच कहूँ,,, वो पल बहुत याद आते हैं,,,





समन्दर किनारे साथ तुम्हारे बैठना,


दूर क्षितिज से आती लहरों को निहारना,


चाँद की दूधिया रोशनी में गीत गुनगुनाना,


लेकर हाथों में मेरा हाथ, तुम्हारा हौले से दबाना,


सच कहूं,,,वो पल बहुत याद आते  हैं,,,,




कांधे पर तुम्हारे रख कर अपना सर,


अपने दुख की पाती तुम्हें सुनाना,


तुम्हारा बड़े ग़ौर से मुझे सुनना,


फिर समेट अपनी बाहों में मुझे ढाढस बंधाना,


सच कहूँ,,, वो पल बहुत याद आते हैं,,,,




✍️तोषी गुप्ता✍️ 

22/02/2021

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

जीना इसी का नाम है,,,,

 *जीना इसी का नाम है*




नादान बचपन की और थी कहानी,


बेफिक्री से जीते तब अपनी जिंदगानी,


ना किसी से गिला, ना किसी से शिकवा है,


बचपन में , जीना इसी का नाम है,,,




अल्हड़ जवानी की बात थी निराली,


रंगीन सपनों से सजी इश्क़ की कहानी, 


अरमानों की पुड़िया समेटे सपने हैं,


जवानी में, जीना इसी का नाम है,,,





नई दुल्हन बनी, पिय के संग चल पड़ी,


हसीन सपनों की हक़ीक़त जी उठी,


साड़ी संग लपेटे , जिम्मेदारियां की पोटली है,


गृहस्थ जीवन में जीना इसी का नाम है,,,,





घर के साथ बाहर की जिम्मेदारियाँ उठाती,


अपने हर कर्तव्य का पालन करती,


दोहरी जिम्मेदारियों के साथ हँसती , खिलखिलाती,


स्त्री जीवन में, जीना इसी का नाम है,,,





गिर कर उठना, उठकर चलना, 


संघर्षों के पथ पर आगे बढ़ना,


कभी थक जाना, फिर रुक जाना,


रुक कर फिर मंज़िल की ओर बढ़ना,


हे मानवों!! जीना इसी का नाम है,,,




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

17/02/2021

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

प्रेरणा

 *प्रेरणा*


बड़े शहर की उच्च शिक्षा प्राप्त एकल परिवार की नेहा की शादी एक कस्बे में उच्च पढ़े लिखे सुलझे हुए लड़के से हुई। कस्बाई माहौल की उसे आदत नहीं थी तिस पर ढेरों बंधनों में उसे संयुक्त परिवार में रहना पड़ता। हालाँकि पति का पूरा साथ नेहा को मिलता। पति के सहयोग से ही उसने अपना शोध कार्य भी प्रारंभ कर दिया लेकिन परिवार का सहयोग ना मिलने के कारण नेहा अकेली पड़ जाती। फिर परिवार की जिम्मेदारियों और नए बच्चे के आगमन से उसका शोधकार्य भी अधूरा रह गया। खुद के लिए समय न निकल पाने के कारण अब नेहा अवसाद में रहने लगी। एक दिन उसके मायके में उसकी दूर की चाची से उसकी मुलाकात हुई। उसकी चाची भी महानगर से उसके मायके शादी होकर आई थी। उसका मायके शहर ज़रूर था लेकिन महानगर नहीं था। उच्च शिक्षित चाची ने उसे बताया कि कैसे शुरू में महानगर से इस शहर आने के बाद उन्होंने स्थितियां सँभाली और फाइन आर्ट्स में पी एच डी करके अब स्कूल में कला शिक्षिका की नौकरी भी कर रही हैं और अपनी कला के जरिये अपने शौक भी पूरे कर रही है। बस इस मुलाकात के बाद ही नेहा की ज़िन्दगी बदल गई। प्रेरणा के रूप में उसकी चाची जो उसे मिल गई थी। उसने मन ही मन ठाना कि वो भी अब परिस्थितियों से हार नहीं मानेगी और अपने सपने पूरे करेगी। वापस आकर उसने धीरे-धीरे मुश्किल परिस्थितियों में ही अपना अधूरा शोधकार्य पुनः प्रारंभ किया। और फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शोधकार्य पूर्ण होते ही उसने कॉलेज में व्याख्याता पद के लिए आवेदन कर दिया और व्याख्याता बन गई। साहित्य से जुड़े होने के कारण अब उसने पुनः लिखना भी शुरू कर दिया, धीरे-धीरे उसके लेख पत्र - पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होने लगे, इस तरह स्वयं के लिए कुछ कर पाने से नेहा भी अब खुश रहने लगी ,उसकी प्रेरणा के रूप में उसकी चाची ने जो राह दिखाई थी, उस पर चलकर नेहा को अपनी मंज़िल नज़र आने लगी थी। 


✍️तोषी गुप्ता✍️

16/02/2021


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

प्रेम का इज़हार - आज के परिप्रेक्ष्य में

 



प्रेम का इज़हार - आज के परिप्रेक्ष्य में*



आज के परिप्रेक्ष्य में यदि प्रेम के इज़हार की बात की जाए, तो  लड़का / लड़की अपने साथी से बेहिचक अपने दिल की बात करते अपने प्रेम का इज़हार करते मिल जाएंगे। कितना आसान हो गया है न आज के परिप्रेक्ष्य में अपने प्रेम का इज़हार करना। संचार सुविधाओं ने तो आज प्रेम के इज़हार को और भी आसान बना दिया है। ना केवल अपने प्रेम का इज़हार बल्कि, अपने दिल की हर बात अपने साथी को खुले शब्दों में आज के युवा बेहिचक कर रहे हैं। 


ये पहले के समय में इतना आसान नहीं हुआ करता था। कई तो ताउम्र अपने प्रेम का इज़हार नहीं कर पाते थे और कई इंतज़ार करते रह जाते कि सामने वाला उससे अपने प्रेम का इज़हार करेगा। कुछ को अपने प्रेम का इज़हार करने में इतना समय लग जाता कि सामने वाला किसी और का दामन थाम चला जाता तो कोई इतनी देर से अपने प्रेम का इज़हार कर पाता कि सामने वाला पहले ही किसी और के साथ वचनबद्ध हो चुका होता।


पहले के ज़माने में प्रेम को निभाने की शिद्दत भी गज़ब की हुआ करती थी। व्यक्ति किसी एक से प्रेम के बंधन में बंध गया तो ताउम्र उस प्रेम के बंधन को निभाता, चाहे वो प्रेम उसे हासिल हो या न हो।ऐसे ही प्रेम के कुछ किस्से प्रेम की मिसाल के रूप में जाने जाते है। राधा कृष्ण का पवित्र प्रेम तो मिसाल है, प्रेम की। बाद के समय में लैला मजनू, हीर रांझा और भी कई प्रेम के मिसाल हुए हैं।


वर्तमान में प्रेम का इज़हार जितना आसान हुआ है, प्रेम के रूप में भी उतना ही परिवर्तन देखने को मिला है।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रेम के इज़हार के बाद भी ज़रूरी नहीं कि उस प्रेम की उम्र ताउम्र रहेगी। और ऐसे भी मिसाल आज देखने को मिलते हैं कि व्यक्ति आभासी दुनिया में अपने प्रेम के इज़हार के बाद प्रभासी दुनिया में भी अपने प्रेम को शिद्दत से निभाता है।


चाहे समय कितना भी बदल जाये , चाहे बीते कल की बात हो या आज की, प्रेम का नाम सुनते ही मन की कलियाँ खिल उठती हैं और मन सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है। प्रेम का इज़हार चाहे साथी से हो या माँ से या पिता से या पुत्र/पुत्री से , बहुत ज़रूरी है प्रेम का इज़हार करना। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रिश्तों में प्रेम का इज़हार और भी ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि अब समय अपने मनोभावों को सामने वाले के सामने प्रकट करने का है। वो समय गया जब लोग मन ही किसी के प्रति अपने प्रेम को समझ पाते हैं। जहां हर तरफ दुनिया में खुले रूप से अपने मनोभावों को प्रकट करने की होड़ सी लगी हुई है वहाँ हर रिश्तों में उसके प्रेम को इज़हार करने की भी नितांत आवश्यकता है। 

✍️तोषी गुप्ता ✍️

छत्तीसगढ़

14/02/2021

ऋतुराज बसन्त

 




*ऋतुराज बसन्त*




मन्द मन्द बहती बसन्ती बयार,


जैसे कहती हों, कानों में कुछ आज,




बिखर रही चहुँ ओर हरियाली,


पीली सरसों और गेहूँ की बाली,




गूँज रही कोयल की कूक,


चिड़ियों की चहचहाहट मधुर,




लाल-पीले फूलों की बगिया,


भँवरे की गूँजन से गूँजे वादियाँ,




फूले पलाश की नारंगी कलियाँ,


आम की बौर से लदी डालियाँ




प्रिय से मिलने को आतुर मन,


ये है ऋतुराज बसन्त का आगमन,




✍🏻तोषी गुप्ता✍🏻

 छत्तीसगढ़

15/02/2021

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

*किसी मोड़ पर*

 *किसी मोड़ पर*




किसी मोड़ पर कदम जब मेरे लड़खड़ा जाएं,


साथी बन तुम साथ मेरे आ जाना,




किसी मोड़ पर मेरा आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ जाए,


हौसला बन तुम मेरा आत्मविश्वास बन जाना,




किसी मोड़ पर जब मैं गलत राह पर बढ़ जाऊँ,


सारथी बन तुम मुझे राह दिखाना,





किसी मोड़ पर जब मैं अपनी जिम्मेदारी भूल जाऊँ,


मार्गदर्शक बन तुम मुझे, मेरी जिम्मेदारी याद दिलाना,




किसी मोड़ पर जब मैं अहम में पड़ जाऊँ,


वहम तोड़ तुम मेरा आईना बन जाना, 




किसी मोड़ पर जब मैं स्वार्थी बन जाऊँ,


कर निबाह तुम अपनी जिम्मेदारियों का मुझे एहसास कराना,




किसी मोड़ पर कदम जब मेरे लड़खड़ा जाएं,


साथी बन तुम साथ मेरे आ जाना,



✍️तोषी गुप्ता✍️

10/02/2021

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

जीने का अंदाज़ कुछ यूँ भी,,,

 *जीने का अंदाज़ कुछ यूँ भी*




ज़िन्दगी जीने अंदाज़ कुछ यूँ रखो,


कोई कदम पीछे भी खीँचे तो मंज़िल दूर ना हो,




अपने लक्ष्य पर ध्यान कुछ इस तरह रखो कि,


राह में रोड़े कोई लाख लगाए, लक्ष्य से तुम कभी ना भटको,




रिश्ते पूरी शिद्दत से कुछ इस तरह निभाओ कि,


कोई गलतफहमी रिश्तों को तोड़ ना पाए,




लोगों में खुशियां कुछ इस तरह बांटों कि,


कोई न तुमसे नाराज़ रहने पाए,




अपनी बात लोगों के सामने कुछ इस तरह रखो,


कोई तुमसे विमुख होने ना पाए,




दोस्तों से दोस्ती कुछ इस तरह निभाओ,


हो जाए कभी अनबन तो भी दोस्ती ना टूटने पाये,




ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ कुछ यूँ रखो,


ज़िन्दगी का हर एक पल फिर से जी जाने को जी करे,






✍️तोषी गुप्ता✍️

06 फरवरी 2021

*संगठन में शक्ति होती है,*

 *संगठन में शक्ति होती है,* 

और संगठन की इस शक्ति को हम प्रकृति के द्वारा बेहतर समझ सकते हैं। जैसे चींटियाँ , हमेशा समूह में रहकर कार्य करती हैं, और समूह में ये असंभव कार्य भी कर लेती हैं, जैसे अपने से कई गुना भारी और बड़े भोजन को अपने गंतव्य तक ले जाना। इसी तरह मधुमख्खियाँ, जो समूह में कार्य कर कुछ ही मिनटों में अपने लिए छत्ता तैयार कर लेते हैं और समूह में कार्य कर ही इतनी अधिक मात्रा में शहद इकट्ठा कर लेती हैं। शहद एकत्रित करने वालों को भी इसी संगठन की शक्ति से अपने छत्तों से दूर रखती हैं। 1-2 नहीं सभी मधुमख्खियाँ संगठित होकर शहद एकत्रितकर्ता पर टूट पड़ती हैं। इसी तरह पेड़ों का ढेरों समूह जीवनदायिनी वर्षा का कारण बनता है। संयुक्त परिवार भी इसके उदाहरण हैं जो एकल परिवार से हमेशा अधिक सुरक्षित और सुखी माने जाते हैं। ये अन्तरा परिवार भी इसका उदाहरण है , जिसमें अब हम सब संगठित होकर साहित्य की ख़ुशबू देश के कोने कोने तक बिखेर रहे हैं। ऐसे कितने ही उदाहरण मिल जाएंगे , सीमा पर मुस्तैदी से डटे हुए हमारे सैनिक जो संगठित होकर साथ रहते हैं और दुश्मन से हर पल हमारी रक्षा करते हैं। ये सब संगठन से ही संभव है। इन सब के कारण ही कहा गया है

*संगठन में शक्ति होती है*


संस्कार



 *बुनियाद*


*संस्कार*


शान्तनु टेबल पर सर झुकाए अपने फाइलों में व्यस्त था। तभी 2 व्यक्ति टेबल के सामने रखी चेयर में आकर बैठते हुए बोले, कैसे हैं शान्तनु बाबू। हमारे काम का कुछ हुआ। शान्तनु ने सर उठा कर देखा, दोनों व्यक्तियों ने एक फाइल और एक पैकेट शान्तनु की तरफ बढ़ाते हुए कहा, अब मान भी जाइये शान्तनु जी, इन फाइलों में सिग्नेचर कर दीजिए।कब तक ईमानदारी की राह में चलते हुए आप अपनी तरक्की रोकेंगे। आप भी तरक्की कीजिये और हमें भी तरक्की का मौका दीजिये। सहसा शान्तनु की आंखों के सामने उसके परिवार की सारी ज़रूरतों का दृश्य घूम गया। बाबूजी का मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना था, माँ के घुटने का ऑपरेशन अब ज़रूरी हो गया था। बेटी का एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला करवाना था, और बेटे की स्कूल की फ़ीस भरनी थी, अब उनकी और स्वाति की तबियत भी तो खराब रहने लगी थी। फिर 2 साल ही तो बचे हैं उनके रिटायरमेंट को। मन तो हो रहा था, तुरंत पैकेट उठा कर रख ले, और फाइलों में सिग्नेचर कर दे। लेकिन शान्तनु ने हाथ जोड़कर विनम्रता से उन्हें मना कर दिया। शान्तनु अब उन्हें वापस जाते हुए देख रहा था, और सोच रहा था आज बाबूजी के बुनियादी संस्कारों की वजह से ही मैं ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर पा रहा हूँ। और साथ ही उसने एक कंपनी में पार्ट टाइम जॉब के लिए आवेदन भेज दिया और स्वयं से बातें करने लगा कि, आय तो बढ़ानी पड़ेगी लेकिन अपनी आय बढ़ाने के लिए वो ग़लत रास्ता कभी नहीं अपनाएगा।

09/02/2021


बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

तुम हो तो मैं हूँ,,,,

 *तुम हो तो मैं हूँ*




तुम हो तो मैं हूँ,


तुमसे ही शुरू,


तुमसे ही ख़त्म हूँ मैं,





जीवन के इस वाद्यवृन्द में,


तुम्हारे हर साज की 


आवाज़ हूँ मैं,





घनी दरख्त के समान तुम, 


और तुम्हारी मजबूत शाखाओं से


निकली लताएं हूँ मैं,





तुमसे ही पहचान मेरी,


जीवन की डोर तुमसे बंधी,


तुम्हारे जीवन के साँसों की आवाज़ हूँ मैं,





तुमसे मैं, 


मुझसे , मेरा ये जीवन,


मेरे वज़ूद की पहचान हो तुम,





शून्य से शुरू,


ज़िन्दगी के सफ़र में,


मेरी चाहतों की मंज़िल हो तुम,






हाँ, 


तुम हो तो मैं हूँ,,,,


हाँ, तुमसे ही तो मैं हूँ,,,,



✍️तोषी गुप्ता✍️

03/02/2021

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

चंदन

 *चंदन*




बहुत तक़लीफ़देह होता है,


वजूद का चंदन हो जाना,


ज़हरीले साँपों का आस्तीन में छिप जाना,




इर्द गिर्द लिपटे सैकड़ों साँपों के बीच,


उनकी कड़ी होती गिरफ़्त से 


अपनी खुशबू बिखेर पहचान आ पाना, 




लोगों के मस्तक पर स्थान पाने,


अपने वज़ूद को धीरे- धीरे खत्म करना,




वहीं मानव तन से मुक्ति पर,


उनकी चिता बन स्वयं ख़ाक हो जाना,




लेकिन चंदन बन तब वज़ूद महक-महक जाता है,


जब यह प्रभु के मस्तक और चरणों में जगह पाता है!!


✍️तोषी गुप्ता✍️

01 फरवरी 2021

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