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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

ऊंची होती उड़ान.....

ऊँची होती उड़ान ........


एक चिड़िया,
खुले आसमान में , 
स्वतन्त्र , स्वच्छंद,
दूर दूर तक अपने  पर फैलाती, 
तरह तरह की कलाबाजियां दिखाती, 
निरंतर और ऊपर और ऊपर उड़न भरती ,  
अपने में मस्त ........ अपने में मगन, 
अपने परों को साफ करती, सजाती, संवारती, 
अपने परों का खास ख्याल  रखती, 
उसकी यही खूबी , उसकी यही प्रतिभा, 
उसके साथी परिंदों को तीर सा चुभती, 
वो उसकी उड़न को रोक तो नहीं सके ,
पर धीरे धीरे उसके परों को नोचना शुरू किया , 
हर एक पर के नोचे जाने पर वह दर्द से तड़प उठती ,
चीखती, और उसके तथाकथित हमदर्द, हमसाथी, सफेदपोश, 
नकाब के  पीछे खुशियां मनाते और ताली बजाते , 
इधर हर एक पर नोचे जाने के बाद, 
वो चिड़िया अपना दर्द भूलकर, 
नए उत्साह, नए हौसले से और ऊँची उड़ान भरने की कोशिश करती , 
ये सिलसिला बढ़ता जा रहा था , 
उसके पर लगातार नोचे जाते 
और दर्द के बाद उसकी उड़ान , 
और ऊँची ...... और ऊँची....... और ऊँची.... होती जाती, 
हर दर्द के साथ वो यही सोचती , 
आखिर कब तक उसके साथी परिंदे , 
इसी तरह उसके पर नोचकर , 
उसकी उड़न पर मुश्किलें डालकर , 
अपनी उड़ान ऊँची दिखा पाएंगे .......? 
और क्यों उसके साथी परिंदे ईमानदारी और मेहनत से 
अपनी उड़ान ऊँची नहीं करना चाहते.....? 
क्या दूसरों के पर काटकर ही ऊँची उड़ान भरी जा सकती है.....? 

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