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apne vajood ki talash me.........
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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

इरादे आजमाती मुश्किलें




"मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं ,
स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,
हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर,
ठोकरें इंसान को जीना सिखाती हैं" 


                                     आज बारहवी का रिजल्ट निकलने वाला है..........मन के किसी कोने में एक डर समाया हुआ है कि कल के पेपर में ना जाने क्या पढने को मिले, कारण............ परीक्षाफल निकलने के साथ ही अख़बारों में हर साल कुछ केस पढने को मिल ही जाते हैं कि फलां ने फेल होने पर फंसी लगा ली या फिर फेल होने के डर से किसी ने आत्महत्या कर ली या आत्महत्या का प्रयास किया या घर से भाग गया. एक बात मेरी समझ से परे है कि न्यू  जेनरेशन के ये बच्चे इतने प्रतिभावान और समझदार होते हुए भी इतनी नासमझी की हरकत क्यों और कैसे कर बैठते हैं? और ये भी कि ये ऊर्जावान पीढ़ी इतनी निराशाजनक कब से हो गई?

                                      विद्यार्थियों की इस प्रवृत्ति के पीछे जितना जिम्मेदार वह स्वयं है, उतने उसके माता-पिता या शिक्षक भी हैं. आजकल पेरेंट्स अपने बच्चो से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखते हैं कि किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को वे अपने परिचितों के बच्चो से किसी भी मायने में कमतर नहीं देख सकते उसी तह शिक्षकों का दोहरा दबाव इस कॉम्पिटिशन के युग में एक विद्यार्थी की मनः स्थिति में क्या प्रभाव डालता होगा इसका आंकलन आप स्वयं कर सकते हैं.
                                       
                                        सभी अपना एक लक्ष्य निर्धारित करके रखते हैं. माना कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो गया तो ऐसा भी तो नहीं कि वह और किसी लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकता. यदि एक छात्र इंजीनियरिंग की परीक्षा में असफल होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो यह उसकी बेवकूफी होगी कारण कि वह अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिये अपना भविष्य बना सकता है 

                                         असफलता का समाधान स्वयं को नुकसान पहुचाना तो नहीं होता और ये भी ज़रूरी नहीं कि एक बार की असफलता हमेशा की असफलता हो.कोशिश करने से तो ज़टिल से ज़टिल कार्य भी पूरा हो जाता है, फिर निर्धारित लक्ष्य क्यों प्राप्त नहीं किया जा सकता..................
  
"कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों..................."

7 टिप्पणियाँ:

PrakashYadav 30 अप्रैल 2010 को 5:11 pm  

toshi ji, sahi samay per sahi article..
badhai...
abhi aapko scrap karen ehi wall th aki bahut dino se kuchh likha nahin aapne...
aaj kal pressure itna ho gaya hai ki bachhon ko kuchh samajh hi nahin aataa ki kya karein...
parents ko care karna chahiye.
jyadatar result ko hauwa bana detein hain parents bhi aur baaki bhi , koi nahin socht aki bachhon ke komal man per iska kya prabhav padega....
bachhe to aakhir bachhe hi hote hain... pressure se bachne galat kadam utha hi lete hai....

दिलीप 30 अप्रैल 2010 को 7:42 pm  

samyik lekh bas doosri pankti me matra dekh le...anyatha na lijiyega...ab bojh itna badh gaya hai...bechare vidyarthi karein bhi to kya karein...

राजेन्द्र मीणा 30 अप्रैल 2010 को 11:06 pm  

चलो कोई तो मिला ....जो हम जैसो के बारे में सोचे ....आपकी प्रस्तुति पढ़कर ...फिर जीने की तमन्ना हुई वरना ....हम तो सरक ही रहे थे

http://athaah.blogspot.com/

धर्मेन्द्र सिंह सेंगर 2 जून 2010 को 11:45 am  

मज़बूत इरादे और दृढ़ इक्छाशक्ति से इन्सान हर असंभव कम को संभव कर सकता है बस आवश्यकता है अपनी आत्मशक्ति को जागृत करने की .

dimple 8 सितंबर 2010 को 8:24 am  

apki bhawnao ke kyee panne padh liye aaj..kavitamay yaade khoobsurat lagi..:)

राकेश कौशिक 31 जनवरी 2011 को 5:26 pm  

"मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं,
स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,
हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर,
ठोकरें इंसान को जीना सिखाती हैं"

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